फागुन में
तन मेरा महुआ हुआ जाता है फागुन में,
हर घाव मरहम हुआ जाता है फागुन में.
ये खुमारी ये सिहरन अजब सी हवा में,
नशा भांग को हुआ जाता है फागुन में.
अंबर की सियाही से खत चाँद ने लिखा,
नशा भांग को हुआ जाता है फागुन में.
अंबर की सियाही से खत चाँद ने लिखा,
आंचल बदली का ढला जाता है फागुन में.
बालों की लटों से ढांप रखा है चेहरा उसने,
मुख गुलाल हुआ जाता है फागुन में.
जाऊं न जाऊं कहाँ जाऊं ठहर जाऊं,
मन उसका बयार हुआ जाता है फागुन में.
भीगा सा तन मन है भीगा सा आंचल,
बिन उनके अंगार हुआ जाता है फागुन में.
मिलने की आस हो और मिल न पाए,
आँखों में रंग उतर आता है फागुन में.
तन मेरा महुआ हुआ जाता है फागुन में,
हर घाव मरहम हुआ जाता है फागुन में.

