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रविवार, 24 मार्च 2013

फागुन में

फागुन में



तन मेरा महुआ हुआ जाता है फागुन में,
हर घाव मरहम हुआ जाता है फागुन में.

ये खुमारी ये सिहरन अजब सी हवा में,
नशा भांग को हुआ जाता है फागुन में.

अंबर की सियाही से खत चाँद ने लिखा,
आंचल बदली का ढला जाता है फागुन में.

बालों की लटों से ढांप रखा है चेहरा उसने,
मुख  गुलाल हुआ जाता है फागुन में.

जाऊं न जाऊं कहाँ जाऊं ठहर जाऊं,
मन उसका बयार हुआ जाता है फागुन में.

भीगा सा तन मन है भीगा सा आंचल,
बिन उनके अंगार हुआ जाता है फागुन में.

मिलने की आस हो और मिल न पाए,
आँखों में रंग उतर आता है फागुन में.

तन मेरा महुआ हुआ जाता है फागुन में,
हर घाव मरहम हुआ जाता है फागुन में.

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

आतंक के साए

आतंक के साए




क्या रंग देखो क्या रंगों का त्यौहार

हर तरफ फैला है अन्धकार

अब न वो रंग, न फागुन की ठिठोली

हर तरफ है तो बस लाल रंग की होली

क्यों वो माँ गाए, क्यों वो बहन गुनगुनाये

क्यों पत्नी माथे पे, अबीर सजाये

जब रंग गया हो, सदा के लिए

लहू की होली में अपना ही चिराग़

क्यों नहीं दीखता अब अबीर में,

वो अबरक का चमकना

क्यों भूल जाता हैं चाँद,

होली की रात, कुछ घरों में निकलना

क्या तलेंगीं गुझिया, पकवान,  वो ऑंखें,

लहू के कड़ाहे में,

जो जी रहे आज भी, आतंक के साए में

दूर तक दीखता है क्यों हर रंग

स्याह सफ़ेद और सुर्ख़

क्यूँ रूठ गए वो हमसे

इन्द्रधनुषी रंग, वो सुरमयी हवाएं,

क्यूँ अब फाग नज़र नहीं आती

उन्हीं को देखने को हमने

अपनी आँखों पे रंगीन चश्मे लगा रखे हैं

 
 
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