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रविवार, 13 मई 2012

चश्में

चश्में 
सुबह सवेरे घर से बाहर निकलते ही
चढ़ जाते हैं सबकी आँखों पर
काले चश्में
जितनी ऑंखें उतने चश्में.
उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत.
चश्में के पीछे
कहीं बाल सुलभ चंचल शरीर, ऑंखें
माँ से आंख मिलाने को डरती,
कहीं गली के  मोड़ तक
एक बहन का पीछा करती.
कहीं अपनी प्रेयसी के गालों पर 
टिक कर न हटने को मजबूर.
कभी बस एक पल 
किसी को देखने को व्याकुल.
पर लक्ष्य बस एक ही.
हम देखते हों और वो देखती न हों
सो आज सुबह होते ही
लाल, नारंगी, सुनहरी ओढ़नी ओढ़े
सूरज के अपने घर से निकली थी धूप.
घर से कुछ दूर आते ही
निकाल फेंकी थी उसने अपनी ओढ़नी.
फिर क्या था
चढ़ गए सबकी आँखों पर चश्में.
हर एक ने बस उसे ही ताका.
जितनी ऑंखें उतने चश्में
उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत
पर लक्ष्य बस एक ही
हम देखते हों और वो देखती न हों.
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