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रविवार, 8 नवंबर 2015

अभिशप्त

अभिशप्त

मैं चाँद हूँ
दागदार हूँ
अनिश्चितता मेरी पहचान है
कभी घटता  कभी  बढ़ता
कभी गुम  कभी हाज़िर 
मैं सूरज की तरह 
चमकता नहीं
पर उसकी तरह 
अकेला भी नहीं
मेरे साथ हैं अनगिनत 
सितारों की चादर
मेरे न होने पर भी 
टिमटिमाते हैं तारे
आने वाली है दीपावली
घुटने लगा हूँ 
फिर एक बार
पूरी धरती जगमगाएगी
राम के स्वागत में नज़र आएगी
नहीं देख पाया 
एक भी दीपावली 
आज तक
हाँ
मैं एक दीपावली
के इंतज़ार में
अमावस का 
अभिशप्त चाँद हूँ  
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