अभिशप्त
मैं चाँद हूँ
दागदार हूँ
अनिश्चितता मेरी पहचान है
कभी घटता कभी बढ़ता
कभी गुम कभी हाज़िर
मैं सूरज की तरह
चमकता नहीं
पर उसकी तरह
अकेला भी नहीं
मेरे साथ हैं अनगिनत
सितारों की चादर
मेरे न होने पर भी
टिमटिमाते हैं तारे
आने वाली है दीपावली
घुटने लगा हूँ
फिर एक बार
पूरी धरती जगमगाएगी
राम के स्वागत में नज़र आएगी
नहीं देख पाया
एक भी दीपावली
आज तक
हाँ
मैं एक दीपावली
के इंतज़ार में
अमावस का
अभिशप्त चाँद हूँ
