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शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

समुद्र मंथन



रात

जब मस्तिष्क

अपने आतंरिक कक्ष में

प्रवेश कर रहा था

सुरमई जुगनू

अंधेरों को रौशन कर रहे थे 

खामोशी अंधेरों को पी रही थी

अंधेरों के कतरे बिखर रहे थे

सांसों का बाज़ार नर्म था

कुछ आयातित कुछ अपहृत सांसें

बेसुकून से उनींदी सी

हर करवट पर कराह रही थीं

इक समुद्र मंथन होने लगा

चेतन, अवचेतन, अतिचेतन सांसें

पूरी गरिमा के साथ धरने पर बैठ गयीं

विस्मृतियों की धूल धुंधलाने लगी

सांसें किसी का एकाधिकार न होने की

विडम्बना से मचलने लगीं

चौदह घड़ी, चौदह पल, चौदह विपल

बीत गए

एक धनवंतरी की तलाश में

पर हाय

सांसों के हाथ आया हलाहल

मस्तिष्क के आंतरिक कक्ष की देहलीज़ पर

ठिठक कर ठहर गया

एक आघात, एक पक्षाघात

और हृदयाघात की आहट 

और हो गया 

सांसों का अवसान 

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