शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

समुद्र मंथन



रात

जब मस्तिष्क

अपने आतंरिक कक्ष में

प्रवेश कर रहा था

सुरमई जुगनू

अंधेरों को रौशन कर रहे थे 

खामोशी अंधेरों को पी रही थी

अंधेरों के कतरे बिखर रहे थे

सांसों का बाज़ार नर्म था

कुछ आयातित कुछ अपहृत सांसें

बेसुकून से उनींदी सी

हर करवट पर कराह रही थीं

इक समुद्र मंथन होने लगा

चेतन, अवचेतन, अतिचेतन सांसें

पूरी गरिमा के साथ धरने पर बैठ गयीं

विस्मृतियों की धूल धुंधलाने लगी

सांसें किसी का एकाधिकार न होने की

विडम्बना से मचलने लगीं

चौदह घड़ी, चौदह पल, चौदह विपल

बीत गए

एक धनवंतरी की तलाश में

पर हाय

सांसों के हाथ आया हलाहल

मस्तिष्क के आंतरिक कक्ष की देहलीज़ पर

ठिठक कर ठहर गया

एक आघात, एक पक्षाघात

और हृदयाघात की आहट 

और हो गया 

सांसों का अवसान 

25 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-07-2022) को चर्चा मंच     "उतर गया है ताज"    (चर्चा अंक-4478)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    

    जवाब देंहटाएं
  3. मैटर सलेक्ट नहीं होता है चर्चा में लेने के लिए।
    कृपया ब्लॉग से ताला हटा दीजिए।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार। शाम को ही हो पायेगा अभी बाहर हूं🙏🙏

      हटाएं
    2. आदरणीय शास्त्री जी आप के सुझाव के अनुसार ताला हटा दिया है |

      हटाएं
  4. सांसों के हाथ आया हलाहल

    मस्तिष्क के आंतरिक कक्ष की देहलीज़ पर

    ठिठक कर ठहर गया

    एक आघात, एक पक्षाघात

    और हृदयाघात की आहट

    बहुत मार्मिक अभव्यक्ति । सच सोते समय ही ये सारा मंथन चलता रहता है ।

    जवाब देंहटाएं
  5. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 03 जुलाई 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. वाह! सराहनीय सृजन।
    हृदयस्पर्शी।
    सादर

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    उत्तर
    1. अनीता जी सराहना के लिए🙏 आभार देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं 🙆🙆

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  7. उत्तर
    1. ओंकार जी मार्मिक तो क्या बस मन के मंथन से ही उपजा था। सराहना के लिए🙏 आभार देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं 🙆🙆

      हटाएं
  8. उत्तर
    1. भारती जी सराहना के लिए🙏 आभार देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं 🙆🙆

      हटाएं
  9. मर्म स्पर्शी गहन भाव।
    सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मर्म स्पर्शी तो क्या मनोमंथन का परिणाम है। सराहना के लिए🙏 आभार देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं 🙆🙆

      हटाएं
  10. मार्मिक बखूबी चित्रण हुआ है।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. संजय जी सराहना के लिए आभार 🙏।देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं 🙆🙆

      हटाएं

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