गुमनाम विरासत
सदियों पुरानी, टूटती गिरती, बेजान ईमारत
और हम ........
खड़ी कर देते हैं उसके चारों ओर
इक चहारदिवारी
घोषित करवा देते हैं उसे "धरोहर"
कभी हमारे घर की
जीती जागती विरासत
तंग आकर हमसे ही
खींच लेती है आप ही अपने चारों ओर
इक चहारदिवारी.
कितनी ही बार उजड़ने बसने की
दास्ताँ बयां करती हैं वो
सदियों पुरानी, टूटती गिरती, बेजान ईमारत.
पर अपने ही घर की विरासत के
चेहरे पर पढ़ नहीं पाते.
उजड़ने, बसने और बिगड़ने के जद्दोजहद की लकीरें
पुराने अवशेषों को जीवंत करने की कवायत में
उन इमारतों को उनका चेहरा लौटाने को
चिनाई में लगाते हैं गोंद, चूना, सुर्की.
अपनी विरासत की
कमजोर. कांपती, टूटती,
चरमराती हड्डियाँ
नहीं नजर आती कभी ख्वाब में.
कभी चमकाने को खंडहर की सूरत
पलस्तर करके
चढ़ा देते हैं मोटी मोटी परतों में
संगमरमर का पाउडर,
बेल का शीरा, उड़द की दाल.
अपने घरों में नहीं नसीब होती
दो जून की रोटी उन्हें
रौशन घरों के इन्हीं किन्हीं कमरों के
चका चौंध अंधेरों में बसती हैं
हमारी अपनी वो गुमनाम विरासतें....
(प्रस्तुत चित्र हम्पी में हांथियों के अस्तबल का है जिसे गूगल से साभार लिया गया है)