कोपलें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कोपलें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 जून 2013

विरक्ति

विरक्ति 


सब कहते हैं
मेरी माँ ने
मेरे शरीर में रोपी थीं
कुछ नन्हीं कोपलें
गन्ने की
तब जब थी मैं
उनके गर्भ में
समय के साथ बढती रही
मैं और वो फसल
हंसना, खिलखिलाना,
हँसाना, मिठास बिखेरना
मेरा पर्याय हो गया
अचानक उम्र के
किसी मोड पर.
छूट गया सब कुछ.
सूखने लगी मैं
और वो फसल
जमने लगा शरीर के भीतर
गुड, गाढ़ी चिपचिपी
चाशनी और शर्करा.
अचानक किसी
चिरपरिचित आवाज का
ये पूछना
तुम वही हो ना
जो अपनी बातों से
हवाओं में मिश्री
घोला करती थीं कभी !
खोजने लगी अपने आपको
झाँका अपने भीतर
ये मैं हूँ ?
पाया उपेक्षित पड़ा
मिठास का भंडार.
अब हँसने मुस्कुराने 
चहकने महकने लगी हूँ
बिखेरना चाहती हूँ 
मिठास एक बार फिर 
उम्मीद है 
जल्दी ही लहलहाएगी
गन्ने की कोपलें 
जो माँ ने रोपीं थीं 
जब मैं थी उनके गर्भ में.
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...