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शनिवार, 30 जनवरी 2010

दूजा ब्याह

दूजा ब्याह


शब्द का कलम से जब ब्याह हुआ था

मैं साक्षी थी और समाज साथ खड़ा था

हुए सातों वचन थे पूरे और सेंधुर दान हुआ था

आँखों ही आँखों में प्यार का इज़हार किया था,

कलम ने फिर शब्द के माथे पे प्यार किया था

सुहाग रात को सुखद स्पर्श का अहसास भी दिया था,

खुश हो गए दोनों खुश हाल हो गए

कलम फिसल कर, कभी शब्दों की बाहों में होता था

शब्द पिघल कर, कभी कलम की आग़ोश में होता

तकनीक की लगी नज़र हाय! ये क्या हो गया,

दूरियां बढ़ने लगीं, कोई गुनाह हो गया

हुआ कलम को संदेह, रिश्ता स्याह हो गया,

पीछा किया तो दर्द का दीदार हो गया

नजदीक जाके देखा तो बेज़ार हो गया,

एकांत था और खट-खट की आती थीं आवाजें

कोई प्यार से शब्द पे फिराता था उंगलियाँ,

दिल टूट गया उसका बैरागी हो गया

शब्द का फिर, कीबोर्ड से दूजा ब्याह हो गया.
आगे की कहानी अगली पोस्ट में अवश्य पढियेगा





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