अपने
अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं
अपनों की पदचापों को पहचाना करती, मैं
अपनों की दस्तक से पहले उनका नाम बताती, मैं
अपनों की ही छाया से आच्छादित होती, मैं
फिर भी अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं
अपनों की हर बात से आशान्वित होती, मैं
अपनों की उपलब्धि पर आल्हादित होती, मैं
अपनों को जब ठेस लगे तब विव्हल होती, मैं
अपनों की हर बात का अनुमोदन करती, मैं
फिर भी अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं
अपनों से भी अपनेपन की आस लगाती, मैं
अपनों के बेगानेपन से यूँ तो अंजान नहीं थी, मैं
अपनों ने जब रिश्ता तोड़ा तो हैरान हुई थी, मैं
अपने ही घर में इक त्यक्ता सामान हुई थी, मैं
इतने बरसों बाद सही पर जान गई थी, मैं
क्यों, अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं
