रविवार, 2 अगस्त 2015

सरगोशी

सरगोशी

बारिश में भीगी 
गीली सीली 
सराबोर धूप ने 
कल मेरी 
सांकल बजाई. 
राहत की साँस ली,
चलो कहीं कोई तो है.
हताश थी,
कितना हठी,
और बेपरवाह 
है सूरज. 
जब भी आता है, 
धूप के बिना
नहीं आता.
सूरज और धूप 
ज्यों धूप और साया 
हो गये.
आ जाओ,
कभी बदली का 
आंचल भी थाम लो
कभी उसके पीछे भी 
छुप जाओ 
कभी तो छोड़ दो 
धूप को अकेला 
मैं इतना सिर्फ 
इसलिए कह रही हूँ 
सबको तपिश देने वाले 
कभी तो जानो 
किसी के न होने का अर्थ.  

12 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार तो होने का अर्थ भी न होने पर ही समझ आता है।

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  2. गीली सीली धूप का आगमन मुबारक हो..सूरज तो हर हाल में एक सा है..बादलों को मनाइए

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 04 अगस्त 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. सबको तपिश देने वाले
    कभी तो जानो
    किसी के न होने का अर्थ
    ...बहुत सुन्दर

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  5. बिलकुल सही । बेहतरीन रचना

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  6. सुन्दर भावाभिव्यक्ति, कितना दर्द देता है किसी के न होने का अहसास.

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  7. आपके भाव के क्या कहनें , लाजवाब प्रस्तुति रही

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