रविवार, 26 जुलाई 2015

मन की बात

मन की बात

मन की बात जबसे मन की न रही, 
इनकी उनकी जन जन की हो गई.
पूरे शहर में चर्चा ये पुरजोर है
 बात भी अब बदचलन हो गई.

मुद्रा का उठना, उठ-उठ के गिरना,
समस्या देश के उत्प्लवन की हो गई,
जो मुह खोले उसकी हत्या, आत्महत्या, 
बात इंसानियत के हनन की हो गयी.

अपराध जगत और उसके किस्से
सुन सुन के इच्छा वमन की हो गई   
नसों में रक्त नहीं, दौड़ती चाटुकारिता
कहते हैं बात महिमामंडन की हो गई.

भ्रूण हत्या, शीलहरण फिर चरित्र हनन
कैसी पराकाष्ठा भ्रष्टाचरण की हो गई.
बिकता है माँ का दूध भी बाज़ारों में अब, 
देखो नीलामी माँ के स्तन की हो गई.

इस तरह मुख म्लान हुआ देश समाज का
घड़ी मनन, चिंतन, स्तवन की हो गई.    
मन की बात जब से मन की न रही,
इनकी उनकी जन जन की हो गई.

पूरे शहर में चर्चा ये पुरजोर है 
मन की बात भी अब बदचलन हो गई.

12 टिप्‍पणियां:

  1. मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक हालात को दर्शाती बहुत सुंदर, सटीक और भावपूर्ण रचना ....

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  2. वर्तमान स्थिति का बहुत ही सुन्दर तरीके से विवेचन करती रचना ...

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  3. Rachanaji Windows-10 अभी तक Reserve की या नहीं। Windows-10 आनी शुरू हो गयी है।

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    उत्तर
    1. धन्यबाद सम्पत जी.अभी रिजरवेसन करवाती हूँ

      हटाएं
  4. सटीक और सार्थक रचना । आजके समाज का आइना।

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  5. mn ki baaton ko mn jane kaise - kaise le leta hai .... or jamane me hawa phail jati hai
    bht hi achha likha aapne

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  6. मन की बात के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया इस रचना ने ... सटीक, लाजवाब ...

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  7. हर एक पंक्ती दिल को छु गई ....बहुत ही सुन्दर लिखा है जज्बातों को

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