रविवार, 31 मई 2015

सच ऐसा भी

सच ऐसा भी 
 
मेरे शहर की 
झुकी हुई इमारते,
यूँ ही नहीं 
गुमनामी में 
खो जाना चाहती हैं. 
खाक में मिल जाना चाहती हैं.
मिटटी हो जाना चाहती हैं.
उन्हें इन्तेज़ार है,
मजबूत कांधों का, 
बाहों का, 
जो उन्हें 
आगोश में ले सके.
बाहुपाश में समां सके 
अपने में समाहित कर सके.
पूर्ण परिपूर्ण सम्पूर्ण कर सके.
हां यह सच है.
मेरे शहर की 
झुकी हुई इमारते 
राह तक रही हैं 
किसी हादसे का.

15 टिप्‍पणियां:

  1. काश की वो हादसा न हो ... ज झुकें उके कंधे ... समय से पहले उन्हें मिल सके मजबूती ...

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  2. Hadsa ka intjar....use mazbooti pradan krni hi hogi..

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-06-2015) को "तंबाखू, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है" {चर्चा अंक- 1993} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. हाद से का ना हो इंतजृार
    पहले ह मिल जायें मजबूत हाथों के हार।

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  5. हर शहर की इमारतों का यही हाल है ...प्यार का सीमेंट तो लगाया ही नहीं ...भूख की रेत से चिनाई करदी ...बहुत खूबसूरत रचना ...

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  6. उफ़..यह त्रासदी हो उससे पहले ही क्यों न कोई उपाय कर लें...भावपूर्ण रचना !

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  7. हादसे से पहले चेते इंसान, तो शायद कम हो नुकसान....हादसे से सचेत करती सार्थक अभिव्यक्ति

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  8. अति उत्तम
    आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई.

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  9. राजकाज है. गि‍र के मानेंगी.

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  10. वैसे राह न भी तकें तब भी हादसा , हालांकि यह भी जिंदगी की सच्चाई है , होता ही है। इमारते झुक ही जाती हैं एक दिन , उम्र की इमारतें भला कब अपनी रीढ़ पर रह सकी है ताउम्र। बहुत खूब लिखा है रचना जी।

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  11. रचना जी, यदि हादसें होने के पहले ही इन्सान उसका सही बंदोबस्त कर ले तो ...लेकिन यही विडंबना है, हम अक्सर हादसों का इंतजार ही करते है! बढ़िया प्रस्तुति...

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  12. काश आपकी कविता से थोड़ी सजगता आ जाये जिम्मेदार लोगों में

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