रविवार, 9 जून 2013

आग

आग

सुलग रही हूँ जाने कब से
समझने लगी थी
नाते रिश्ते दुनिया जबसे
कभी महकती
सबको महकाती
खुशबू बिखेरती
कभी धुआं धुआं
भीतर बाहर सब तरफ
कालिख ही कालिख
जलना जलना सुलगना
मेरी आदत हो गई
उम्र के इस पड़ाव पर सुलग.
नहीं जल रही हूँ आज भी
पर एक लौ की तरह
नहीं छोड़ती अब धुआं
सुगंध या दुर्गंध
धुन आज भी वही
जलना जलाना
अपने भीतर बाहर
और आसपास
फैलाना तो सिर्फ प्रकाश
राह दिखाना अँधेरा दूर करना
कभी मैं अगरबत्ती सी
जला करती थी
आज दिए सी जल रही हूँ.

30 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया रचना जी सुप्रभात हमारी एक निश्चित भूमिका है आप अपनी भूमिका में खरी हैं तभी आप सर्वश्रेष्ठ हैं और नियति बदली जा नहीं सकती

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  2. khud jalna diye ki tarah aur doosron ko roshnee dena ....sundar prastuti

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  3. सुप्रभात - परोपकार कष्ट दायक होता है जो बिरले ही कर पाते हैं - प्रेरक और सार्थक प्रस्तुति

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. दीये की तरह हर कोई कहाँ जल पाता है दूसरों का तम हरने के लिए. बहुत सुन्दर.

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  6. कभी मैं अगरबत्ती सी
    जला करती थी
    आज दिए सी जल रही हूँ
    अनुकरणीय अभिव्यक्ति
    सादर ....

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  7. वाह ! सुगंध न सही, प्रकाश ही सही।
    आग का काम भी परोपकारी है।

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  8. सुलगते सुलगते कब आग लग जाती है, कहाँ पता लगता है।

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  9. जल कर रोशनी देना हमारी प्रकृति है सुंदर अभिव्यक्ति !!

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  10. बहुत ही सुन्दर रचना .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (10.06.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर किया जायेगा. कृपया पधारें .

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    उत्तर
    1. धन्यबाद नीरज मेरी कविता को ब्लॉग प्रसारण में शामिल करने हेतु.

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  11. जीवन के समाप्त होने तक धुँआ देने से तो जलकर प्रकाश फैलाना अधिक सार्थक है!! बहुत अच्छी रचना!!

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  12. दिये की तरह जल कर प्रकाश फैलाना ही जीवन की सार्थकता है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  13. एक संपूरन जीवन यात्रा सुगंधमय, प्रकाशमय । स्व की सुंदर प्रस्तुति।

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  14. दिए की तरह जलकर प्रकाश फैलाना जीवन की सार्थकता है
    ... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ... आभार

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  15. दूसरों को राह तो दिए ही दिखाते हैं ...
    उनकी तरह जलना ही जीवन है ... फिर चाहे रोइश्ते जलें या कुछ और ...

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  16. खुद जलना, दूसरों को प्रकाश देना! यही दीपक का काम है!
    ढ़
    --
    थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!

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  17. कभी मैं अगरबत्ती सी जलती थी अब दीपक सी जलती हूँ । दोनो स्थितियों में मानवता का पूजन ।
    बहुत सुंदर ।

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  18. आदरणीया रचना जी खूबसूरत... नारी मन का बहुत सुन्दर वर्णन ..इसी लिए तो पूज्य हैं ...
    जलना जलाना अपने भीतर और आस पास
    फैलाना तो सिर्फ प्रकाश
    बहुत खूब
    भ्रमर 5

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  19. बहुत खूबसरत एहसास लिए हुए .....

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  20. कभी मैं अगरबत्ती की तरह जला करती थी
    जीवन के संघर्ष की गहन अनुभूति
    सुंदर बेहतरीन रचना
    बधाई

    आग्रह है- पापा ---------

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  21. नारी मन का बहुत सुन्दर वर्णन ....रचना खूबसूरत

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