रविवार, 30 जून 2013

विरक्ति

विरक्ति 


सब कहते हैं
मेरी माँ ने
मेरे शरीर में रोपी थीं
कुछ नन्हीं कोपलें
गन्ने की
तब जब थी मैं
उनके गर्भ में
समय के साथ बढती रही
मैं और वो फसल
हंसना, खिलखिलाना,
हँसाना, मिठास बिखेरना
मेरा पर्याय हो गया
अचानक उम्र के
किसी मोड पर.
छूट गया सब कुछ.
सूखने लगी मैं
और वो फसल
जमने लगा शरीर के भीतर
गुड, गाढ़ी चिपचिपी
चाशनी और शर्करा.
अचानक किसी
चिरपरिचित आवाज का
ये पूछना
तुम वही हो ना
जो अपनी बातों से
हवाओं में मिश्री
घोला करती थीं कभी !
खोजने लगी अपने आपको
झाँका अपने भीतर
ये मैं हूँ ?
पाया उपेक्षित पड़ा
मिठास का भंडार.
अब हँसने मुस्कुराने 
चहकने महकने लगी हूँ
बिखेरना चाहती हूँ 
मिठास एक बार फिर 
उम्मीद है 
जल्दी ही लहलहाएगी
गन्ने की कोपलें 
जो माँ ने रोपीं थीं 
जब मैं थी उनके गर्भ में.

31 टिप्‍पणियां:

  1. Samay ke saath waqayee bahut kuchh peechhe chhot jata hai...

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  2. न जाने कितनी बातें सीखी हैं गर्भ में, माँ के स्नेह स्वरूप।

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  3. अपने मन की भावनाओं को बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति दी है आपने. ज़िन्दगी कई बार अपने अन्दर निहित चीजों को भूल सी जाती है. ऐसे में उन सबल पक्षों को जागृत करना आत्म-संतोष तो देता है और पर-हित भी . आपकी रचनाएँ हमेशा मन को छूती है.

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  4. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [01.07.2013]
    चर्चामंच 1293 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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    उत्तर
    1. धन्यबाद सरिता जी चर्चामंच के १२९३ वें अंक में मेरी रचना को शामिल करने के लिये.

      हटाएं
  5. सुख और दुःख , अंतर्मन में ही छुपे रहते हैं। बस पहचानने की ज़रुरत होती है। बढ़िया रचना।

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  6. समय के साथ जो कहीं दब जाता हैं उसे जगाना जरुरी है... अच्छी एहसास लिए रचना !!

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  7. ये सकारात्मकता ही जीवन्तता प्रदान करती है जीवन को

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  8. बहुत ही बेहतरीन,मन के भावनाओं की सार्थक प्रस्तुतिकरण।

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  9. परिस्थितियाँ मन कि मिठास को कहीं पीछे कर देती हैं .... इसको पुन: स्थापित कर लेना कठिन सा लगता है लेकिन जहां चाह वहाँ राह ...मिठास बरकरार रहे ...

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  10. यही मिठास जीवन को अमृतमय बनाती है।

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  11. आमीन ....
    पोस्ट बहुत पसंद आया
    सादर
    हार्दिक शुभकामनायें ......

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  12. ईश्वर आपको कभी स्वयं से दूर न करे ,जीवन की इस आपा धापी में बहुत कुछ पीछे छूट जाता
    है और हम आगे निकलते जाते हैं....बहुत सुंदर रचना ....शुभ कामनाएं ..

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  13. समय के थपेड़े कभी खुद को ही जिन्दगी से दूर कर देते हैं .....
    अच्छा हुआ आपने अपने आप को फिर से पा लिया ..खूब मिठास और मुस्कान बांटे....
    शुभकामनायें!

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  14. आपने मातृत्व का बहुत ही सुन्दर अंकन किया है आभार

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  15. गन्ने की खेती बढे, हरदिन बढे मिठास । फसल निरोगी स्वस्थ हो, नसल असल विश्वास ॥

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  16. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  17. समय के साथ साथ बहुत कुछ भूलने लगता है ... कठोर लम्हे भी कभी कभी कड़वाहट भर देते हैं ... पर फिर अंतरमन बचपन की यादों में मीठा हो जाता है .. .

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  18. वाह, जल्दी ही मीठी मीठी गनेरियों के रूप में आपकी कविताएँ मिलेंगी तब तो...

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  19. अंतस को छूती बहुत प्रभावी रचना...

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  20. बहुत सुंदर रचना,मन को छू गई,आभार

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  21. बेहद सशक्त भावाभिव्यक्ति .....सहज अनुभूत तबदीली मन की परिवेश की .ॐ शान्ति .

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  22. मन को छूती हुई सुंदर अनुभूति
    बेहतरीन रचना
    बधाई

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  23. मन को छूती हुई बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  24. ये उम्मीद बनी रहे .....

    सार्थक रचना ....!!

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  25. गहन अर्थ लिए बहुत ही बेहतरीन रचना...
    :-)

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