रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सृष्टि


सृष्टि



जब चाँद कभी झुक जाता है
और बादल को गले लगाता है
जब कोई कहीं शर्माता है
और झूम-झूम वो जाता है
तो बारिश का महीना आता है

जब कोई याद किसी को करता है
और सारा इतिहास गुजरता है
जब वक़्त कहीं पे ठहरता है
और आँखों से निर्झर बहता है
तो सावन का महीना आता है

जब नन्ही आँखों में कोई सुंदर सपने संजोता है
और कागज़ की कश्ती को ले कोठे पे दौड़ा जाता है
जब इन नन्ही आँखों को करने को कुछ न रह जाता है
तो रिमझिम का महीना आता है

जब अपनी बिटिया रानी का इक अच्छा रिश्ता आता है
और उस रिश्ते की खातिर इक गांठ लगाया जाता है
जब ख़ुशी-ख़ुशी गुडिया रानी के सपने को सजाया जाता है
और उसे प्रीतम के संग डोली में बिठाया जाता है
तो वृष्टि का महीना आता है

जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है
और वो विकराल रूप ले आता है
जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है
फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है
तो सृष्टि को पसीना आता है.

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! कमाल की रचना रची है रचना जी आपने ....
    बहुत ही खुबसूरत और अहसासों से भरपूर अपनी इस रचना में आपने आखिर में आज समाज की बुराई और कडवे सच को उजागर किया है .....
    बहुत मुबारक हो आपको !
    शुभकामनायें!

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  2. संबंधों को उनके बंधन में सुन्दर ढंग से व्यक्त करना ही अच्छा लगता है।

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  3. जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है
    और वो विकराल रूप ले आता है
    जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है
    फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है
    तो सृष्टि को पसीना आता है ........
    Uffffff ....
    समाज के घिनौने सच को ,
    बदसूरती को खूबसूरती
    से सबके सामने दर्शाती
    रचना, रोंगटे खड़ी करती
    ......

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  4. समाज की सबसे खिनौनी सच्चाई को व्यक्त करती
    संवेदनशील रचना...

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  5. शर्मनाक , मानवता के लिए ...
    शुभकामनायें !

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  6. सच्चाई को व्यक्त करती
    संवेदनशील रचना..


    RECENT POST... नवगीत,

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  7. सुन्दर सी रचना को एक सच ने कितना असुंदर कर दिया..
    बहुत गहन भाव
    अनु

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  8. रिमझिम बूँदों की फुहार...से ओले पड़ने तक का सफ़र करवा दिया... आपकी रचना ने...!
    ~सादर!!!

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  9. जब शर्मसार करने वाले ऐसे कुकृत्य होंगे तो "स्रष्टि को पसीना" आना लाजमी है

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  10. जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है
    और वो विकराल रूप ले आता है
    जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है
    फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है
    तो सृष्टि को पसीना आता है ..
    बहुत सुंदर .बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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  11. ओह! बहुत कुछ कहती हुई रचना..

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  12. सृष्टि को पसीना आता है ...पसीना नहीं उस समय प्रलय आणि चाहिए ..... सार्थक रचना

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  13. प्राकृति के माध्यम से गहरी बात कह दी ... ओर समाज को आइना भी दिखा दिया ...
    प्रभावी लेखन ...

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  14. गहन भाव लिये ... बेहद सशक्‍त रचना मन को छूती हुई
    आभार

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  15. चाँद पर काला धब्बा जैसा सच...सशक्त रचना|

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