रविवार, 18 अक्तूबर 2015

एक रामलीला यह भी

एक रामलीला यह भी 

यूं तो होता है 
रामलीला का मंचन
वर्ष में एक बार
पर मेरे शरीर के 
अंग अंग करते हैं
राम, लक्ष्मण,
सीता और हनुमान
के पात्र जीवन्त.
देह की सक्रियता
सतर्कता, तत्परता 
और चैतन्यता के
लक्ष्मण की उपस्थिति
के बाद भी
मष्तिष्क का रावण 
देता रहता है प्रलोभन
भांति भांति के जब तब 
दिग्भ्रमित हुआ है 
मन जब जहाँ 
अपह्रत हुई है 
ह्रदय की सीता तब तहां 
आत्मा का राम 
करता है करुण कृन्दन 
अंतर्ज्ञान का हनुमान 
करता है प्रयास 
पुनर्मिलन का 
आत्मा और ह्रदय का 
राम और सीता की तरह
एक उम्र गुजर जाती है 
अपने ही ह्रदय को
अपनी ही आत्मा से 
मिलने में 
एक सार करने में.

14 टिप्‍पणियां:

  1. रचना जी, बिलकुल सही है, आत्मा का मिलान करने में उम्र निकल जाती है। बढ़िया प्रस्तुति....

    उत्तर देंहटाएं
  2. रचना जी, बिलकुल सही है, आत्मा का मिलान करने में उम्र निकल जाती है। बढ़िया प्रस्तुति....

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 20 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. वाह..और इस तरह रामायण पल पल घटती है..बहुत सुंदर !

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  5. अंतर्मन की रामलीला कभी ख़त्म नहीं होती ..
    बहुत सुन्दर रचना

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  6. सुन्दर और भावपूर्ण। दुर्गा पूजा और दशहरे की शुभकामनाएँ।

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