सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

वृत्त

वृत्त



एक वृत्त जिसकी त्रिज्या परिधि और व्यास

सतत गतिशील हैं

कभी फैल जाते हैं

अनंत दिशाओं तक

कभी सिमट कर समाहित जाते हैं

केंद्र बिंदु में

ये एक चमत्कारिक और अभिमंत्रित वृत्त है

अपने ही माथे पे एक लाल वृत्त संजोये

हमारे कहे अनकहे भय समझने की अद्भुत क्षमता

हमारे विस्थापन के साथ

पल पल घटता बढ़ता

उसका वात्सल्यमय परिधि सा आंचल

हमें पुकारती परस्पर विपरीत

दिशाओं में फैली व्यास सी बाहें

कभी अपनी बाँहों में भरने को तत्पर

कभी सामने उठी हुई समान्तर त्रिज्या सी

अर्ध वृत्त बनाते हुए भी

सम्पूर्णता की परिचायक बाहें

कभी अपने अंक में भर

सम्पूर्ण वृत्त को केन्द्रीभूत कर

सत्यापित करता अपने अस्तित्व को

मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे

जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त

जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.

चित्र गूगल से साभार

33 टिप्‍पणियां:

  1. सच है, वात्सल्य की कोई सीमा नहीं है।

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  2. मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे

    जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त

    जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

    हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.

    Kya kamaal ka likha hai aapne! Nishabd hun!

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे
    जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त
    जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

    बहुत सुन्दर अहसास ।
    बेहतरीन प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. रेखागणित में जीवन या जीवन का रेखागणित? इस रेखागणित का अंत बहुत सुन्दर बन गया है। एक तो हर वृत में मां को पाना और एसा वृत्त देने वाले के प्रति नतमस्तक होना । उत्तम रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. Adbhut... aap ek dum alag tereh ki upamayein dhundh laati hain.. yehi khubsoorti h aapki kavita ki...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे

    जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त

    जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

    हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.
    bahut sundar ,mamta ka aasra sadaiv maa me hi khojte hai tabhi maa ki chhavi jhalkti hai .

    उत्तर देंहटाएं
  7. हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.

    और हर मान में एक वृत्त ...बहुत सुन्दर ..

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  8. हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है.
    बहुत सुन्दर कविता है रचना जी.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वात्सल्य की परिधि, एक ऐसी परिधि है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है...

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  10. बहुत ही ख़ूबसूरत रचना ...
    अंत भावुक कर गया....
    मेरे ब्लॉग पर इस बार
    एक और आईडिया....

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  11. उम्दा लेखन के लिए बधाई.
    धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  12. लाजवाब लिखे हो मैडम जी..
    तस्वीर के साथ आपकी कविता का आनंद कई गुना बढ़ गया है...

    इस वात्सल्य भाव के आगे नमन हैं...

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  13. बहुत ही ख़ूबसूरत कविता है..
    ...माँ ब
    कभी फैल जाते हैं
    अनंत दिशाओं तक
    कभी सिमट कर समाहित जाते हैं
    केंद्र बिंदु में
    ये एक चमत्कारिक और अभिमंत्रित वृत्त है

    बहुत ही ख़ूबसूरत कविता है..माँ का वात्सल्य एक वृत्त के समान ही तो है...कभी फैलाव देता हुआ...कभी केंद्र में समाहित करता हुआ

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  14. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  15. जीवन की ज्योमिती को बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है आपने.. जीवन सच मुच वृत्त ही तो है.. विज्ञान के गूढ़ विषय को सहजता से व्यक्त करती है आप.. सुंदर कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत सुंदर रचना. गहराई में डूब कर रचना का सृजन किया है.

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  17. बहुत खूब ,... प्रेम को परिधि में कहाँ बाँधा जा सका है अब तक ... अछा प्रयोग है आपका इस रचनमें ...

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  18. aapne geomatrical terms ko kavita mein istemaal kiya hai....lovely experiment.

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  19. maa ko acha likha..u maa ko kai tarah se likha gya ..par jitna pado utan kam aur yaha kuch naya mila...

    badhayee

    उत्तर देंहटाएं
  20. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  21. "मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे
    जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त
    जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है
    हाँ! मैंने हर वृत्त में एक माँ को पाया है."
    रचना जी ,
    आपकी रचना पढ़ी वाकई नतमस्तक हूँ हर उस वृत्त पर जिसकी परिधि पर हमलोग हैं और केन्द्रक में मां जो केंद्र से परिधि तक चलायमान है.बिम्ब-योजना और शिल्प भी कविता से साक्षात्कार में मददगार है. अत्यंत सुंदर रचना के लिए बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  22. मैं नत मस्तक हूँ उस प्रभु के आगे
    जिसने हम सब को दिया है एक ऐसा वृत्त
    जो हमसे शुरू हो हम पर ही समाप्त होता है

    माँ का वात्सल्य एक वृत्त के समान ही है!
    उत्तम रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  23. चमत्कारिक और अभिमंत्रित वृत्त को प्रणाम.

    उत्तर देंहटाएं
  24. इस रचना को पढ़ा नहीं महसूस किया.

    दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

    उत्तर देंहटाएं

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