अंत
पहले से ही हताश
हवा के चेहरे पर
उड़ने लगी हैं हवाईयां.
जीवन के अंत का आभास
जो दिला रहे हैं उसके
अनवरत बढते नाखून
बचपन में सुना करती थी
चूहों के लगातार बढते दांत
उससे निजात पाने को.
अपना जीवन बचाने
और बढ़ाने को
सतत कुछ न कुछ
या सब कुछ
कुतरने की मज़बूरी.
पर ये हवा
चूहों की तरह
नहीं कुतरती कुछ भी
न ही खरोंचती है
कुछ भी कहीं भी
अपने नाखूनों से
ये डालती है खराशें बस
पेड़, पौधों, टहनियों
और डालियों पर.
कभी मीलों चलने पर
मिल जाते हैं
इक्के दुक्के दरख्त.
जगती है खराश डालने
और जीने की कुछ आशा
अचानक पड़ जाता है
उसका चेहरा पीला.
कहीं आगे निरा रेगिस्तान
तो नहीं देखा है उसने.
आह....
जवाब देंहटाएंकष्ट हुआ पढ़ कर...
गहन रचना.
अनु
फासले थे तो ठीक था
जवाब देंहटाएंयह सामने विराम .... धुंधला है सबकुछ
चुभती रचना !
जवाब देंहटाएंकल 01/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
जवाब देंहटाएंधन्यवाद!
रचना जी!
जवाब देंहटाएंबहुत ही खूबसूरत कविता.. हमेशा की तरह मुग्ध हूँ और मेरी तरफ से स्टैंडिंग ओवेशन!! बहुत खूब!!
गहन भाव व्यक्त करती...
जवाब देंहटाएंसंवेदनशील रचना...
चूहों के दांतों के बारे में पहली बार जानकारी मिली .... जब तक इक्के दुक्के दरख्त हैं तो रेगिस्तान की क्यों सोचें ? आज कल कुछ निराशा की तरफ आपका ध्यान ज्यादा है ।
जवाब देंहटाएंअंत तो निश्चित है ..फिर भी हमें जिसे खोना ही है उसे पाने के लालसा में कुछ और खो ही देते है .. आपके लिए हम भी
जवाब देंहटाएंझंझकोरती रचना !सब को एक साथ ऐसा अनुभूति क्यों हो रहा ......... !!
जवाब देंहटाएंउसका चेहरा पीला. कहीं आगे निरा रेगिस्तान तो नहीं देखा है उसने,,,,
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया अनुभूति कराती कविता,,,,
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पर ये हवा
जवाब देंहटाएंचूहों की तरह नहीं कुतरती
कुछ भी
न ही खरोंचती है
कुछ भी कहीं भी
अपने नाखूनों से
ये डालती है खराशें बस
बहुत सुन्दर व्यंजनात्मक अभिव्यक्ति.
पर ये हवा
जवाब देंहटाएंचूहों की तरह नहीं कुतरती
कुछ भी
न ही खरोंचती है
कुछ भी कहीं भी
अपने नाखूनों से
ये डालती है खराशें बस
बहुत सुन्दर व्यंजनात्मक अभिव्यक्ति.
जीवन-मरण, सुख-दुख, दरख्त-रेगिस्तान...एक खुशनुमा,एक भयावह...यही तो चक्र है|
जवाब देंहटाएंगहन अभिव्यक्ति !!
जीवन की वेदना का चक्र कुछ ऐसा ही..... गहरी अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रूपक उठाया है हवा का .शाम बहुत उदास थी कह कर लेखक खुद को तो बचा ही लेता है यहाँ तो हवा ही जीना मुहाल किए है सारा पर्यावरण सामाजिक और राजनीतिक गंधाने लगा है .
जवाब देंहटाएंबढ़िया रचना है रचना जी की .
वाकई अंत करीब नज़र आने लगा है ...हवाओं का दहशत में आना लाज़मी है .....बहुत देर हो जाये उससे...... पहले कुछ करना होगा..गहन अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंइसके पहले "मौत से बातें" और अब "अंत" शीर्षक से लिखी कवितायें अचम्भित करने वाली हैं.आप सुलझी हुई परिपक्व ब्लोगर हैं.आपसे आशावादी रचनाओं की सदैव अपेक्षा रहती है.
जवाब देंहटाएंबहुत गहन और मर्मस्पर्शी..
जवाब देंहटाएंवाह! बहुत ही अच्छी लगी..पर सोच को झझकोरती हुई..
जवाब देंहटाएंगहरे भाव लिए बेहतरीन रचना |
जवाब देंहटाएंWah hawa ko bimb bana kar halat par ek sashakt rachna.
जवाब देंहटाएंप्रकृति के प्रति चिंतित होने के लिए बाध्य करती अच्छी कविता लगी। हवा, चूहे, दरख्तों के माध्यम से गज़ब की व्यंजना अभिव्यक्त हुई है! चूहों के कुतरने और खराश शब्द का प्रयोग भी अनूठा है। कुल मिलाकर कहूँ तो आपकी यह कविता इस विषय में अनूठे प्रयोग के साथ दस्तक देती है।..वाह!
जवाब देंहटाएंमार्मिक!
जवाब देंहटाएंमन के भीतर कहीं-न-कहीं चुभ गई यह रचना।
मन का दर्द शब्दों में झलक रहा है
जवाब देंहटाएंगहन अभिव्यक्ति !!!
जवाब देंहटाएंओह कैसी चली हवा ...
जवाब देंहटाएंगहन अभिव्यक्ति ....!!
कई सवाल खड़ी कर रही है ये रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
आपकी रचना एक अलग सा ही एहसास करा जाती है.कुछ निराशा से ओतप्रोत लगी यह प्रस्तुति.
जवाब देंहटाएंपोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
जवाब देंहटाएंबेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
गहन चिंतनमयी कविता।
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