रविवार, 20 फ़रवरी 2011

उत्तराधिकारिणी

उत्तराधिकारिणी




चहल, चुहल शोर और हुडदंग का

माहौल था उस घर में

रहते थे जब

होली दीवाली दशहरा उस घर में.

समय बदला सरोकार बदला.

रहने लगे

इकादाशी, प्रदोष और पूनम उस घर में

मौसम बदला मिजाज़ बदला

घर करने लगा कृष्ण पक्ष उस घर में.

झलक दिखला जाये गलती से जो चांदनी

यूँ लगे की शुक्ल पक्ष है

यही कहीं उस घर में

होती रहीं आशाएं बलवती

आ ही जाएगी कभी

वो भी खिलखिला के इस घर में.

सूरत बदली, सीरत बदली

अपने साजो सामान........

अँधेरे, सन्नाटे, और अनजान डर के साथ

पसरने आ गई इक दिन अमावस उस घर में.

लोग बदले लगाम बदली.

इक दिन वो आई

इतराई, इठलाई, अलसाई

छिटकी और बिखर गई उस घर में.

बोली उनको न आना है

न वो आएंगे इस घर में

मैं हूँ मौनी अमावस "असली उत्तराधिकारिणी "

अब से मैं ही रहूंगी इस घर में.

49 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरे भाव प्रस्तुत किए हैं आपने । समय का सच लिखा है । एक छोटा सा दिया अगर जलता रहे तो अमावस रुक नहीं सकती । इस अच्छी कविता के लिए धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ !

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  2. आधुनिक जीवन शैली में मानव कितना अकेला होता जा रहा है ! उसके अकेले जीवन दर्द उभर कर सामने आया है इस कविता में . मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती करती है यह कविता. आभार.

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  3. बदलते समय का हमारे मन-आंगन पर हो रहे प्रभाव की अभिव्यक्ति कविता का केन्द्र बिन्दु है।

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  4. रचना जी अकेलेपन और जीवन के द्वन्द को विम्ब्पूर्ण ढंग से व्यक्त किया है इस कविता में.. आपकी कविता अलग दृष्टि लिए होती हैं..

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  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. अमावस के मौन का आगमन...
    वाह, बहुत खूब।

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  7. अकेलेपन की त्रासदी का सशक्त चित्रण जहाँ मौन का ही साम्राज्य होता है।

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  8. is maun me man ki kai bhashaye gunjati hai hilaure leti hai,kahani guthti hai par andekhi kahi .uttam .

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  9. समय बदलता गया भाव में एकाकीपन आता गया .और अंततः इंसान भीड़ में अकेला हो गया ...गहनता से अभिव्यक्त किया है भाव को

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  10. अकेले पण की व्यथा को सुन्दर विम्बों से उकेरा है..गहन भाव लिए बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..

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  11. वाह जी. बहुत ही गहरे अर्थ लिये आप की यह रचना धन्यवाद

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  12. बहुत खूब..... कमाल के भाव चुने हैं शब्दों में ढालने के लिए ..... संवेदनात्मक

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  13. अमावस के मौन का आगमन...
    वाह, बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  14. आज के जीवन के तरीके में जो बदलाव आये हैं , एकल परिवार होने लगे हैं तो मौनी अमावस का साम्राज्य सा ही हो गया है ...बहुत अच्छी प्रस्तुति ..

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  15. मौनी अमावस का आधिपत्य जतलाना, वर्तमान युग का फैशन हो गया है। ऐसी भावना उत्पन्न होने लगी है कि मौनी अमावस का रूप यदि अख्तियार नहीं किया तो क्या किया। समाज के एक कुरीति को कुरेदती हुई यह कविता एक सशक्त संकेत दे रही है। बधाई।

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  16. मौनी अमावस्या की इस अंदाज में विवेचना आपकी लेखनी ही कर सकती है जिसमें गूढ़ अर्थ समाहित हैं.

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  17. कभी कभी यूँ ही नज़र लग जाती है घर की खुशहाली कों और अमावस्या आ जाती है । --सार्थक अभिव्यक्ति

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  18. rachna , sirf ek baat kahna chahunga ki bahut hi gazab ki compositions hai , aise pahle kabhinahi dekhi , aapne mausam bhi daal diya, zindagi ke rang bhi daal diya aur inhi sab se gujarte hue apne aapko ghar ki maalkin kah diya jo ki wakayi me ek gahra sach hai ......atishay chaangli aahe he kavita

    बधाई

    -----------

    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .

    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.

    """" इस कविता का लिंक है ::::

    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

    विजय

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  19. गहन शब्‍दों के साथ भावमय प्रस्‍तुति ।

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  20. मौनी अमावास्या...!!!

    क्या सुन्दर प्रयोग किया है आपने इसका एक दृश्य,समय के बदलते सरोकारों को दिखाने के लिए...वाह...वाह...वाह...

    गहन भाव लिए बहुत ही सफल सार्थक और सुन्दर कविता...

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  21. मन में पलते अकेलेपन के दर्द को शब्दों का जामा दे दिया है
    एकाकीपन के असलियत बयाँ करती रचना

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  22. बहुत ही सुन्दर शब्द रचना.
    अद्भुत बिम्ब प्रयोग.
    आपकी कलम को सलाम.
    लगता है आज कुछ पढ़ा है

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  23. रचना जी आज तो मन ठीक नहीं इसलिए .....
    रजनीश जी की ही टिपण्णी को दोहराती हूँ .....

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  24. बदलते समय ने तीज त्योहारों के उल्लास को सिर्फ मौनी अमावस्या में बदल दिया है ...
    अभिनव प्रयोग ...!

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  25. ब्लॉग लेखन को एक बर्ष पूर्ण, धन्यवाद देता हूँ समस्त ब्लोगर्स साथियों को ......>>> संजय कुमार

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  26. मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती करती है यह कविता. बहुत अच्छी प्रस्तुति ..

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  27. भावमयी प्रस्तुति. अकेलेपन की व्यथा का सशक्त चित्रण.

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  28. महानगरीय जीवन शैली में बढते अकेलेपन की त्रासदी का मुखर चित्रण. आभार.

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  29. कविता अच्छी लगी.अच्छी कविता के लिए धन्यवाद

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  30. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ ...बहुत रचनात्मक भाव है आपके लेखन में .....

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  31. आदरणीय रचना जी
    नमस्कार !
    गहन भाव लिए बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..

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  32. महानगरीय जीवन शैली का सशक्त चित्रण

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  33. त्योहारों के माध्यम से घर का माहौल बता दिया, वाह, बहुत सुन्दर और मार्मिक।

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  34. मौनी अमावस! आह ! ये कहाँ सा आ गई घर मे!
    ....सुंदर ढंग से जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  35. वर्तमान दौर का यथार्थ चित्रण !
    भावपूर्ण कविता के लिए आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  36. अद्भुत कविता.......बहुत ही बेहतरीन ढंग से बिँबोँ को चित्रित किया आपने । आभार रचना जी ।

    " सितारा कहूँ क्यूँ चाँद है तू मेरा.........गजल "

    उत्तर देंहटाएं
  37. अद्भुत कविता.......बहुत ही बेहतरीन ढंग से बिँबोँ को चित्रित किया आपने । आभार रचना जी ।

    " सितारा कहूँ क्यूँ चाँद है तू मेरा.........गजल "

    उत्तर देंहटाएं
  38. रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति ,*****
    महानगरीय जीवन शैली का सशक्त चित्र,
    अच्छी कविता के लिए धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ !*******

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  39. बहुत सुन्दर और मार्मिक। धन्यवाद|

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  40. मुझे लगा मेरे घर के लिये ही ये कविता कही है। सच मे बेटियों के विवाह के बाद तो घर मे मौनी ही उत्तराधिकारिणी है। दिल को छू गयी रचना। शुभकामनायें।

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  41. Very touchy.U have depicted a sense of isolation being felt in this modern world. Goood Very.

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  42. मैं हूँ मौनी अमावस "असली उत्तराधिकारिणी "
    अब से मैं ही रहूंगी इस घर में.

    नि:शब्द करती है ये पंक्ति

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  43. Excellent blog post, I have been reading into this a bit recently. Good to hear some more info on this. Keep up the good work!

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