रविवार, 7 नवंबर 2010

समीकरण

समीकरण





याद नहीं पर जाने कब से सुनती आई हूँ.

सुहागिन औरतें रखती हैं निर्जला,

करवा चौथ का उपवास,

अपने पति की लम्बी आयु के लिए,

मैंने भी रखे कितने ही ...

केवल तुम्हारे नाम पर.

पर आज थोडा असहज महसूस कर रही हूँ,

सोचा सच आज बता ही दूँ.

मैंने रखे ये उपवास.

तुम्हारे दीर्घायु होने के लिए नहीं,

अपने निजी स्वार्थ वश.

क्योंकि जानती हूँ.

तुम्हारे बिना मैं हूँ ही नहीं.

पर कल ही मेरी पिछली कविता,

के जवाब में तुमने कहा.

इस धरती पर तुम्हार तुम होना,

सम्भव ही नहीं,

मेरे मैं हुए बिना.

सो अब से मैं ये उपवास रखूंगी तो सही,

पर अपनी लम्बी उम्र के लिए.

न की तुम्हारी.


(चित्र साभार गूगल के सौजन्य से)  


38 टिप्‍पणियां:

  1. kya baat kahi hai rachna ji aapne apni kavita ke madhyam se ,bilkul sahi baat ,aakhir ye hamara apna hi swarth hota hai.
    bahit hi achhi post lagi aapki.
    deepawali vbhia-duuj kke pawan parv ki aapko hardik badhai
    poonam

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  2. रचना जी , भला इतनी बड़ी सच्चाई भी कोई बोलता है ।
    खैर यह तो सच है कि सारे रिश्ते नाते एक स्वार्थ की डोर से बंधे रहते हैं ।
    लेकिन यह डोर बंधी रहे , यह भी अनिवार्य है । वर्ना हम में और पाश्चात्य सभ्यता में क्या फर्क रह जायेगा ।

    आपकी रचनाएँ पढ़कर नतमस्तक हो जाना पड़ता है ।

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  3. समीकरण को एक नया रूप रूप दिया है ….नारी हमेशा पुरुषों के गणित पर चली है …पर अब उसे अपने अस्तित्व को बताने के लिए कुछ नए समीकरण
    बनाने होंगे ….बहुत अच्छी कविता ..कुछ नयी सी सोच लिए हुए ...

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  4. गम्भीर अभिव्यक्ति, भाव शब्दों को जीतते हुये।

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  5. Hmm agar wo apse hain to apke hone se zaruri kuchh bhi nahi..hamesha ki tereh behad alag aur behad prabhaavi :)

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर कल ही मेरी पिछली कविता,
    के जवाब में तुमने कहा.
    इस धरती पर तुम्हार तुम होना,
    सम्भव ही नहीं,
    मेरे मैं हुए बिना.
    सो अब से मैं ये उपवास रखूंगी तो सही,
    पर अपनी लम्बी उम्र के लिए.
    न की तुम्हारी.
    वाह...आत्मविश्वास से भरी इस रचना के लिये बधाई स्वीकारें.

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  7. सच ही कहा है...स्त्री असल में तब तक खुद को सुरक्षित, संपन्न, समृद्ध और बहादुर समझती है जब तक उसके सिर पर उसके पति का हाथ होता है..और अपनी कमजोर स्थिति से बचने के लिए और अपनी खुशियों को बनाए रखने के लिए वो अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती तो है लेकिन अंतस में तो उसके अपने सुख की कामना भी होती है...अब आप बात को सच का जामा पहना ही रही हैं तो पुरुषों को जरा और खुश होने दो. :):):):) मैं और सच कह देती हूँ.
    सुंदर सत्य दर्शाती रचना.

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  8. Rachanaji badee himmat se aapne apnee baat rakhee hai! Apnee baat bina kisee laag lapet ke kahna bhi ek kala hotee hai! Wah!

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

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  10. रचना जी झकझोर कर रख दी आपकी इस कविता ने.. सचमुच नए समीकरण बनते दिख रहे हैं मुझे भी... नए सोच की कविता ..

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  11. थोडा अलग सी लगी ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  12. क्या बता है ..नई सोच को सलाम .बहुत अच्छा लगा पढकर.

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  13. बहुत खूब ! शुभकामनायें स्वीकार करें ...

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  14. "क्योंकि जानती हूँ.
    तुम्हारे बिना मैं हूँ ही नहीं."
    रचना जी,नमस्कार.प्रकृति और पुरुष के शास्वत संबंधों को स्वीकारने का यह अद्भुत अंदाज बहुत रास आया. आपकी रचनाओं में महसूसी गई सच्चाई से साक्षात्कार एक अच्छा अनुभव है मेरे लिए .

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  15. सही मे समीकरण बदल दिया……………सिर्फ़ इतना ही समझ आ जाये तो ज़िन्दगी बेहद आसान और हसीन हो जाये……………बेहतरीन प्रस्तुति।

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  16. अपने आप को सम्भव करने की कोशिश ??? दिल भर आया !!! बिना अपने हुए हम इतना करते हैं ??? हम जीते कैसे हैं रचना !!

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  17. मैंने रखे ये उपवास.
    तुम्हारे दीर्घायु होने के लिए नहीं,
    अपने निजी स्वार्थ वश.
    क्योंकि जानती हूँ.
    तुम्हारे बिना मैं हूँ ही नहीं.
    .......
    sunder samikaran

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  18. मेरा अपना मानना है हम कुछ भी (Negative या Positive ) करें स्वार्थ तो होता ही है.

    ".....सो अब से मैं ये उपवास रखूंगी तो सही,
    पर अपनी लम्बी उम्र के लिए.
    न की तुम्हारी."

    बेहद मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ.

    सादर

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  19. अनोखा अंदाज़ है इस रचना में ... अपने आप को समझना और समझाने की प्रक्रिया है इस रचना में .. लाजवाब .....

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  20. sare rishte anyonyasrit hi to hain!!!
    ek ke bina duje ka astitva adhura hai!!!
    samikaran ke tah ko talaashti sundar rachna!

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  21. जिंदगी के गणित में नए समीकरणों के आयाम जोड़ती भाव प्रवण रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  22. एक नया समीकरण बन गया ये तो!
    अच्छा लगा ..:)...
    तुमसे मैं हूँ मुझ से तुम!
    नयापन लिए भावपूर्ण कविता .

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  23. सुर नर मुनि सबकी यह रीती/ स्वारथ लाग करें सब प्रीती। सब से अलग हट कर एक रचना एक नई बात कहती रचना ।’ मेरे मै हुये बिना ’ इतनी गम्भीरता ला दी रचना में कि रचना अनेकार्थी हो गई है

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  24. इस धरती पर तुम्हार तुम होना,

    सम्भव ही नहीं,

    पूरी रचना के भाव बहुत अच्छे हैं .....
    जहां एक दुसरे के प्रति ऐसी भावना हो प्यार वहीँ जिन्दा रहता है .....
    मुबारकां .....!!

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  25. इस धरती पर तुम्हार तुम होना,

    सम्भव ही नहीं,

    मेरे मैं हुए बिना.
    जिस समर्पण भाव से औरत पति के लिये सब कुछ करती है वहीं पति का ये अंह उसे आहत कर देता है। कम से कम अपने बारे मे कब सोचना शुरू करेगी औरत जब भी करेगी तभी उसका ये अहं उसमे भी समर्पण भाव भर देगा
    लेकिन औरत शायद ऐसा कभी न कर पाये कि केवल अपने लिये सोचे---- मुझे संशय है अगर कर भी देगी तो शायद ये समाज -- समाज नही रह जायेगा। जब दो अंह टकराते हैं तो क्या बचता है? आग बुझाने के लिये पानी ही चाहिये। शुभकामनायें।

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  26. जीवन के समीकरण को जीवंत बनाती भावाभिव्यक्ति..... बहुत सुंदर

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  27. bahut badi baat hai is rachna me..Rachna ji...aik kranti kee gunj hai... yah rachna kal charchamanch par rakhungi..aapka abhaar

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  28. रचना जी , मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद , आपके ब्लॉग को मैंने पहले भी देखा था ...आपकी रचनात्मकता लाजबाब है ...इस कविता में आपने नए भाव बोध के साथ अपने विचारों को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है ...शुभकामनायें

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  29. सही है
    रचना हो तुम
    रचनाकार हो तुम
    सपना हो तुम
    और साकार भी हो तुम

    आपकी यह कविता अक अनूठे प्रश्न को आयाम दे गयी है रचना जी.........
    सच ही तो है 'तजुर्बे का पर्याय नहीं'

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  30. स्वार्थ के रूप अलग अलग हो सकते है पर यदि हम सुख चाहते है तो बहुत कुछ स्वार्थ से होकर जाता है....भले उससे किसी का नुकसान ना हो पर इसे एक प्रकार का स्वार्थ ही कहते है...बढ़िया और एक अलग प्रकार की भाव से निहित कविता की प्रस्तुति की आपने...सही लगा...बधाई..

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  31. बहुत सुंदर रचना एक दम अलग हटके भाव लिए हुए !

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  32. इस कविता में आपने नए भाव बोध के साथ अपने विचारों को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है ...शुभकामनायें

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  33. नारी का यह रूप स्वागतयोग्य है, इसी तरह मानसिक उर्जा का संचार होता रहे और नारी मुखर होती रहे तो समाज की संरचना को एक नया आयाम मिलेगा। बहुत खूब।

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