रविवार, 17 जून 2012

सरकती धूप

सरकती धूप

ये गर्मियों की उमस 
ऊब भरी दोपहरी
बचती छिपती फिरती हूँ
इन सबसे
याद करती हूँ
सर्दियों की वो मखमली गुनगुनी धूप,
बेटियों को तेल की मालिश करना,
नहलाना, काला टीका लगाना 

बिछौना बिछाना,
थपकी देकर धूप में सुलाना    
थोड़ी थोड़ी देर में आना,
छू कर देखना,   
सरकती धूप के साथ 
बिछौना सरकाते जाना   
पर बेटियां तो अब 
बड़ी हो गयी हैं....
जी लेने को वो दिन दोबारा 
ले आई हूँ कुछ कच्चे आम 
तैयार की हैं नन्हीं नन्हीं फांकें 
बड़े प्यार से मलती हूँ मसाला 
भिगोती हूँ तेल में 
भरती हूँ दो नन्हीं बरनियों में
रखती हूँ धूप में 
कई बार जाती हूँ 
देखती हूँ हिलाती हूँ,
झकझोरती हूँ  
झांकती हैं मुस्कुराती हुई 
कुछ आम की फांके 
दो पल को तेल के बाहर 
फिर अलसाती हुई सरक जाती हैं 
डूब जाती हैं तेल में 
और मैं धूप के साथ साथ 
जगह बदलती रहती हूँ दिन भर   
यूँ लगता है 
आज भी धूप का सिरा पकड़े
खड़ी वहीँ हूँ 
जहाँ थी आज से बीस बाईस साल पहले 
पर सच तो ये है कि 
बेटियां तो बड़ी हो गयीं हैं अब.

37 टिप्‍पणियां:

  1. उन स्मृतियों में अभी भी धूप का प्रकाश पड़ रहा है..

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  2. जिंदगी की धूप भी रूप badalti rahti है .
    गर्मी में सर्दियों की यादें बहुत सकूं देती हैं .
    बढ़िया rachna .

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  3. ख़ास होता है आपका अंदाज़..सुन्दर लिखा है..

    उत्तर देंहटाएं
  4. आचार भी आप उन्ही बेटियों के लिए बना रही होगीं .....
    आन्नद दुगुना हो रहा होगा ,बेटियों को ख़ुशी हो रही होगी .....

    उत्तर देंहटाएं
  5. आचार भी आप उन्ही बेटियों के लिए बना रही होगीं .....
    आन्नद दुगुना हो रहा होगा ,बेटियों को ख़ुशी हो रही होगी .....

    उत्तर देंहटाएं
  6. उन बीती स्मृतियों की यादों में आज भी बदलती धूप का प्रकाश पड़ रहा है,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  7. अंबिया बिटिया एक सी, प्रभु की रचना देख ।

    संस्कार सेवा वही, सुन्दर यह आलेख ।

    सुन्दर यह आलेख, तेल-बुकुवा की सेवा ।

    नपी तुली सी धूप, रूप क्या निखरा देवा ?

    बढ़ा रहे दोउ स्वाद, जिंदगी बीते बढ़िया ।

    रविकर देता दाद, फले, फूलें ये अंबिया ।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अचार और प्यार का बड़ा करीबी रिश्ता है.....

    पहले माँ हमें बनाकर देती थीं.......
    अब हम बना कर उनको पहुंचाते हैं......

    बड़ा प्यार आया आपकी रचना पर.......

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  9. सच में बेटीया अब बड़ी हो गयी है !

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या कहूँ इस अन्दाज़ के लिये……सुभान अल्लाह

    उत्तर देंहटाएं
  11. इस खड़ी गर्मी में तो धूप की कवि‍ता तक पढ़ने से ही पसीना आने लगता है ☺

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  12. bahut sundar likha hai,

    yahn bhi aaiye

    http://sanjaykuamr.blogspot.in/2012/06/blog-post_13.html

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  13. बच्चे अपने लिए कहाँ बड़े होते हैं , कहाँ सरकती धूप में वे दिन खोते हैं .... यादों की गुनगुनी धूप में उनका असर बना रहता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत भावपूर्ण रचना...माँ होती ही ऐसी हैं...बेटी की पसन्द का अचार आज भी बनाते हुए...

    उत्तर देंहटाएं
  15. समय के साथ चलती स्मृतियाँ .... सुंदर पंक्तियाँ

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  16. बेटियों की याद में कच्चे आम का बिम्ब ॥गजब की सोच ... बहुत प्यारी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  17. मुझे अपनी अनुभूति जैसी ही लगी यह कविता , बेटियां बड़ी जो हो गयी हैं ...

    बही भी नन्हे क़दमों सी ठिठकती बेटियां देखते ही उनके वे पल याद आ जाते हैं और मैं कह देती हूँ , तुम लोंग इतनी जल्दी बड़े क्यों हो गये :)

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  18. अचार की बर्नियों में
    बेटियों का उजाला है....
    आपका अंदाज निराला है

    सुन्दर... बहुत सुन्दर...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  19. वाह ... अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ...

    उत्तर देंहटाएं
  20. सर्दियों की वो मखमली गुनगुनी धूप,
    बेटियों को तेल की मालिश करना,
    नहलाना, काला टीका लगाना
    बिछौना बिछाना, थपकी देकर धूप में सुलाना थोड़ी थोड़ी देर में आना, छू कर देखना, सरकती धूप के साथ बिछौना सरकाते जाना पर बेटियां तो अब बड़ी हो गयी हैं.... जी लेने को वो दिन दोबारा ले आई हूँ कुछ कच्चे आम
    तैयार की हैं नन्हीं नन्हीं फांकें


    सुन्दर कविता, सुन्दर अंतरायन.

    उत्तर देंहटाएं
  21. सर्दियों की वो मखमली गुनगुनी धूप,
    बेटियों को तेल की मालिश करना,
    नहलाना, काला टीका लगाना
    बिछौना बिछाना, थपकी देकर धूप में सुलाना, थोड़ी थोड़ी देर में आना, छू कर देखना,
    सरकती धूप के साथ बिछौना सरकाते जाना पर बेटियां तो अब बड़ी हो गयी हैं....
    जी लेने को वो दिन दोबारा
    ले आई हूँ कुछ कच्चे आम
    तैयार की हैं नन्हीं नन्हीं फांकें


    सुन्दर कविता, सुन्दर अंतरायन.

    उत्तर देंहटाएं
  22. बेटियां समय के साथ साथ बढती हैं ... बार स्म्रितियं की धूप वहीं रहती हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. भले ही बिटियाँ बड़ी हो जाए ....फिर भी वो अपनी ही रहती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  24. धूप के साथ साथ चलती जीवन यात्रा ...
    सुंदर अभिव्यक्ति ...

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  25. जीवन के ठहराव और उसकी गतिशीलता- दोनों को अच्छी तरह रेखांकित किया आपने।

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  26. धूप के सरकने के साथ-साथ जिंदगी भी आगे बढ़ती रहती है।
    बड़ी प्यारी सी कविता है।

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  27. बेटियाँ भी प्यारी...अँचार भी प्यारे
    तभी तो धूप छोड़ने का मन नहीं करता
    बहुत प्यारी लगी कविता|

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  28. कल 20/06/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    बहुत मुश्किल सा दौर है ये

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  29. धूप बार बार आती है और सरकती रहती है पर समय सिर्फ यादों में वापस आता है ...बहुत सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं
  30. खूब रचा है प्रतीक विधान बेटियाँ और कच्ची आमी दोनों नाज़ुक होतीं हैं और अचार ज़रा सी चूक हुई फंफूद पकड लेता है . अच्छी प्रस्तुति .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बुधवार, 20 जून 2012
    क्या गड़बड़ है साहब चीनी में
    क्या गड़बड़ है साहब चीनी में
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  31. सचमुच आचार और बेटियों का बहुत गहरा नाता है माँ के साथ... जब तक माँ थी कभी आचार नहीं बनाया वे ही भेज देती थी और हम खूब खाते थे अब वो नहीं हैं आचार हम बनाते हैं लेकिन कभी मन नही करता खाने का... सुन्दर भावविभोर करती कविता... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  32. pichhli baar bhi maine likha tha jo publish nahi hua...fir se dohrati hun....aap ki rachnaayen, unki gehenta aur apki rachnaao me kamaal ka bimbo/prateekon ka prayog aapki pahchaan hai. apki rachnaon ko padh kar khud k lekhan me bhi ek paripakwta laane ka vichar banta hai lekin ho nahi pata.

    is rachna k jariye bhi kacchi aami-achaar ki dekhbhaal ko chhoti betiyon ke saath prateekatmak prayog kamaal ka hai.

    उत्तर देंहटाएं
  33. बेटियाँ बड़ी होकर पुराने घऱ नहीं आतीं लेकिन याद अधिक आती हैं. सुंदर कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  34. यही जीवन है। हम वहीं खड़े याद करते हैं जबकि हमारे अपने अपने पथ पर काफ़ी आगे चल रहे होते हैं।

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