रविवार, 13 मई 2012

चश्में

चश्में 
सुबह सवेरे घर से बाहर निकलते ही
चढ़ जाते हैं सबकी आँखों पर
काले चश्में
जितनी ऑंखें उतने चश्में.
उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत.
चश्में के पीछे
कहीं बाल सुलभ चंचल शरीर, ऑंखें
माँ से आंख मिलाने को डरती,
कहीं गली के  मोड़ तक
एक बहन का पीछा करती.
कहीं अपनी प्रेयसी के गालों पर 
टिक कर न हटने को मजबूर.
कभी बस एक पल 
किसी को देखने को व्याकुल.
पर लक्ष्य बस एक ही.
हम देखते हों और वो देखती न हों
सो आज सुबह होते ही
लाल, नारंगी, सुनहरी ओढ़नी ओढ़े
सूरज के अपने घर से निकली थी धूप.
घर से कुछ दूर आते ही
निकाल फेंकी थी उसने अपनी ओढ़नी.
फिर क्या था
चढ़ गए सबकी आँखों पर चश्में.
हर एक ने बस उसे ही ताका.
जितनी ऑंखें उतने चश्में
उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत
पर लक्ष्य बस एक ही
हम देखते हों और वो देखती न हों.

30 टिप्‍पणियां:

  1. ये काला चश्मा भी मुआ , अच्छी बुरी दोनों नज़रों को छुपाने का काम करता है ।
    लेकिन लगाने वाले के चेहरे को भी तो निखार देता है ।

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  2. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  3. जितनी आँखें उतने चश्मे ... उतनी दृष्टि, उतने तर्क

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  4. चश्मे बद्दूर अब हो गया चश्मे से दूर

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  5. अपने-अपने चश्में से लोग दुनिया देखते हैं, और देखने वाला अपने-अपने ढंग से चश्मे को ... जैसे इस गीत में नयिका उसे सौतन मानती है
    “सौतन चश्मा बीच में आए नैन मिले कैसे ..
    रूठे-रूठे पिया, मनाऊं कैसे?”

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  6. बहुत सुन्दर व प्रभावपूर्ण रचना....्मातृ दिवस की शुभकामनाएं..

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  7. आपकी रचना जितनी बार पढिए, लगता है पहली बार पढ रहा हूं।
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.....!!!

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  8. जितनी ऑंखें उतने चश्में
    उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत
    पर लक्ष्य बस एक ही
    हम देखते हों और वो देखती न हों.
    क्या बात है रचना जी!! बहुत खूब.

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  9. काला चश्मा काम का है....
    शुभकामनायें आपको !

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  10. वाह.......................

    क्या पारखी नज़र है....
    :-)

    सादर

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  11. चश्मे के माध्यम से सोच और नीयत की बात बखूबी रखी गई है ...बहुत सुंदर !

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  12. काला चश्मा का महत्व...प्रभावशाली रचना.

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  13. आँख में पानी नहीं काला चश्मा देखा!

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  14. बहुत ही सशक्‍त लेखन ...आभार ।

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  15. हर किसी का अपना अपना चश्मा देखने के लिए ... अपनी अपनी नज़र छुपाने के लिए ...

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  16. हर किसी का अपना अलग ही चश्मा हैं ...
    चश्मे के पीछे से देखने का अपना अलग मज़ा हैं ....सामने वाले की सोच और आँखे पढ़ने का मौका मिल जाता हैं .....


    बेहद सटीक लेखन ...आभार

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  17. सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  18. जितनी आँखें उतने चश्मे ...... प्रभावपूर्ण रचना....

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  19. हलके शब्दों में बहुत ही गहन बात कही आपने... सुन्दर!
    सादर,
    मधुरेश

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  20. 'कुछ भी' लिख देने से बढ़ कर सृजन के लिए बधाई

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  21. जितनी ऑंखें उतने चश्में
    उतने ही विचार, सोच, नियत, बदनियत
    पर लक्ष्य बस एक ही
    हम देखते हों और वो देखती न हों.

    आपने एक सच्चाई को बहुत गहराई से खोज निकाला है।

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  22. sab kale chashme ka kamaal hai jiske peechhe se sab kuchh dikhe par vo dekh kya raha hai vo na dikhe . sunder prastuti.

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  23. ऊपर से सरल पर अर्थ ..गहरे तक वार करती हुई...सुन्दर रचना के लिए बधाई..

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