रविवार, 30 जनवरी 2011

मंजिलें


मंजिलें
 

कैद हैं आज भी वो मंज़र इन नज़ारों में,
जब हम भी गिने जाते थे प्यारों में.  
 
हँसते हंसाते खिलखिलाते याद आते थे,
कभी हम भी सबको  बहारों में.
 
अपने कांधों पे उठाये अपनी ही  टहनियां, 
खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.
 
उड़ती है धूल, ओढ़ लेते हैं धूल की चादर,
फिर भी खड़े हैं वो आज तलक राहों में.
 
आ गया पतझड़, रूकती नहीं धूप तक उनसे,
शुमार  हो गए  वो भी, मेरी तरह बेचारों में. 
  
रूठ जाती है, अब तो मंजिलें भी हमसे,
शिकवे भी करती हैं हमसे इशारों में
 
सिखा मुझको  मर के  जीने का हुनर, ऐ दरख़्त!
डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में. 
 
मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.
 
यूँ तो जिगर छलनी, कई बार हुआ मेरा,
शामिल नहीं हूँ फिर भी  अश्कबारों में.  
 
यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,
आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में.

44 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया रचना. खासकर

    "यूं तो जिगर छलनी ,कई बार हुआ मेरा
    शामिल नहीं हूँ फिर भी अश्क्बारों में"

    शुभ कामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  2. यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में.
    बहुत अच्छी रचना ...
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    आ गया पतझड़, रूकती नहीं धूप तक उनसे,
    शुमार हो गए वो भी, मेरी तरह बेचारों में.


    मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.

    जज़्बात खूबसूरती से कहे हैं ...बहुत खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में

    बहुत सुन्दर ।
    प्रकृति से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मर के जीता है यहाँ कोई हज़ारों में। वाह, बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीय रचना दीक्षित जी
    नमस्कार !
    कई बार हुआ मेरा,शामिल नहीं हूँ फिर भी अश्कबारों में. यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में.
    .आखिरी पंक्तियाँ तो बस आश्चर्यजनक रूप से कमाल हैं .बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर रचना है रचना जी

    -----------
    बस एक और हो जाये ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.

    बहुत अच्छी रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  10. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में ...

    बहुत खूब ... बहुत ही लजवाब रचना है ... जिंदादिली काम आती है इस जिंदगी में ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में।

    वाह, बहुत बढ़िया। अच्छी कल्पना।

    इस सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई रचना जी।

    उत्तर देंहटाएं
  12. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    हरेक शेर लाज़वाब..बहुत सुन्दर गज़ल..

    उत्तर देंहटाएं
  13. कोमल भावों को सँजोये यह रचना हृदय को छूती है और एक ऐसी यात्रा का आनंद प्रदान करती है जिससे हर कोई जीवन में कभी न कभी दो चार होता ही है!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.
    shandaar rachna

    उत्तर देंहटाएं
  15. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में

    बेहद सुंदर ..... खूब

    उत्तर देंहटाएं
  16. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

    उत्तर देंहटाएं
  17. उड़ती है धूल, ओढ़ लेते हैं धूल की चादर,फिर भी खड़े हैं वो आज तलक राहों में. आ गया पतझड़, रूकती नहीं धूप तक उनसे,शुमार हो गए वो भी, मेरी तरह बेचारों में. रूठ जाती है, अब तो मंजिलें भी हमसे,शिकवे भी करती हैं हमसे इशारों में सिखा मुझको मर के जीने का हुनर, ऐ दरख़्त!डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.

    एक एक पंक्ति बहुत खूबसूरती से लिखी गयी है -
    जीवन के अनुभवों का एहसास कराती सुंदर रचना -

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत अच्छी रचना ...शुभ कामनाएं .


    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  19. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में

    बहुत सुन्दर रचना है.... रचना जी

    उत्तर देंहटाएं
  20. आशा में निराशा और निराशा में आशा ,दोनों चित्रण दिखा इस रचना में.
    खूब है.

    उत्तर देंहटाएं
  21. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    आ गया पतझड़, रूकती नहीं धूप तक उनसे,
    शुमार हो गए वो भी, मेरी तरह बेचारों में.


    मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.
    bahut bahut bahut hi achchhi rachna ,rachna ji ki ,man ko chhoo gayi .

    उत्तर देंहटाएं
  22. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.


    अपने जज्बातों को बहुत सार्थक तरीके से पेश किया है आपने ..पूरी रचना अर्थपूर्ण है ..शुक्रिया आपका

    उत्तर देंहटाएं
  23. मरते हैं यहाँ लोग रोज न जाने कितने

    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में

    बहुत सुन्दर ..

    उत्तर देंहटाएं
  24. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    वाह जी, क्या बात है ... बहुत सुन्दर पंक्तियाँ है !

    उत्तर देंहटाएं
  25. भाव अपने प्रवाह में बहाते रहे और मैं आपके शब्दों पर अपनी अनुभूतियों को सजाता रहा इसलिए गज़ल मुझे मेरे बहुत करीब लगी.

    उत्तर देंहटाएं
  26. संदेशों का पिटारा - बहुत सुंदर. बहुत से पाठकों ने अपनी-अपनी पसंद की पंक्तियाँ को दर्शाया है इसलिए में भी "खुद्दारी की प्रतीक" इन पंक्तियों को अपनी पसंद बताना चाहूँगा.

    "सिखा मुझको मर के जीने का हुनर, ऐ दरख़्त!
    डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में"

    उत्तर देंहटाएं
  27. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.जज़्बात बहुत खूबसूरत,बहुत अच्छी लगी आपकी
    ये कल्पना।..

    उत्तर देंहटाएं
  28. मरते हैं यहाँ लोग रोज, न जाने कितने,
    मर के भी जीता है कोई एक हजारों में.

    बहुत अच्छी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  30. यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,
    आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में.
    रचना जी कोमल भावों से बुनी यह रचना उस तलाश को तलाशती प्रतीत होती है जो अब जीवन केलिये जरूरी हो गया है.भौतिकता की चका-चौंध में खोये अपनेपन की तलाश का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण है.

    उत्तर देंहटाएं
  31. सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई!
    मंगल कामना के साथ.......साधुवाद!
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  32. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में

    वाह,रचना जी,
    संवेदना की गहन अनिभूति होती है इन पंक्तियों को पढ़कर !
    गहरे भाव से भरी हुई प्रस्तुति के लिए साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  33. "यहाँ दूर तलक कोई अपना नहीं मिलता यारों,
    आओ लौट चलें, बसें फिर एक बार तारों में."

    भावपूर्ण कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  34. अपने कांधों पे उठाये अपनी ही टहनियां,
    खड़े हैं कितने ही दरख़्त कतारों में.

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  35. rachna ji itne din net se door rahne ke karan apki koi rachna padh nahi payi maafi chaahti hun.

    bahut samvedansheel rachna likhi hai.

    सिखा मुझको मर के जीने का हुनर, ऐ दरख़्त!
    डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में

    ye panktiya sach me bahut hi gazab hai.

    badhayi.

    उत्तर देंहटाएं
  36. हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' -दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
    प्रिय हिंदी ब्लॉगर बंधुओं ,
    आप को सूचित करते हुवे हर्ष हो रहा है क़ि आगामी शैक्षणिक वर्ष २०११-२०१२ के जनवरी माह में २०-२१ जनवरी (शुक्रवार -शनिवार ) को ''हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' इस विषय पर दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है. विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संगोष्ठी को संपोषित किया जा सके इस सन्दर्भ में औपचारिकतायें पूरी की जा रही हैं. के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजन की जिम्मेदारी ली गयी है. महाविद्यालय के प्रबन्धन समिति ने संभावित संगोष्ठी के पूरे खर्च को उठाने की जिम्मेदारी ली है. यदि किसी कारणवश कतिपय संस्थानों से आर्थिक मदद नहीं मिल पाई तो भी यह आयोजन महाविद्यालय अपने खर्च पर करेगा.

    संगोष्ठी की तारीख भी निश्चित हो गई है (२०-२१ जनवरी २०१२ ) संगोष्ठी में अभी पूरे साल भर का समय है ,लेकिन आप लोगों को अभी से सूचित करने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है क़ि मैं संगोष्ठी के लिए आप लोगों से कुछ आलेख मंगा सकूं.
    दरअसल संगोष्ठी के दिन उदघाटन समारोह में हिंदी ब्लागगिंग पर एक पुस्तक के लोकार्पण क़ी योजना भी है. आप लोगों द्वारा भेजे गए आलेखों को ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जायेगा . आप सभी से अनुरोध है क़ि आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें .
    आप सभी के सहयोग क़ी आवश्यकता है . अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें


    डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
    के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय
    गांधारी विलेज , पडघा रोड
    कल्याण -पश्चिम
    pin.421301
    महाराष्ट्र
    mo-09324790726
    manishmuntazir@gmail.com
    http://www.onlinehindijournal.blogspot.com/ http://kmagrawalcollege.org/

    उत्तर देंहटाएं
  37. ऐ दरख़्त!डरती हूँ, गिनी जाने से मैं बेसहारो में
    bahut khoob

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...