रविवार, 9 जनवरी 2011

धागे

धागे




बाखबर से बेखबर होती रही,

समय की गठरी पलटती रही.

रातों को उठकर जाने क्यों,

मैं अपनी ही चादर सीती रही.

संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,

फिर भी सीवन दिखती रही.

अपनों की झालर बनाई सही थी,

जाने किसमें तुरपती रही.

बातें चुन्नटों में बांधी बहुत थीं,

न जाने कैसे निकलती रहीं.

ख़ुशी औ ग़म के सलमे सितारों में,

मैं ही जब तब टंकती रही.

मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,

अपनी ही बखिया उधडती रही,

बेखबर से बाखबर होना जो चाहा,

रातों में समय को पिरोती रही.

हाथों को मैंने बचाया बहुत,

पर अंगुश्तानो से सिसकी निकलती रही.

सुराखों से छलनी हुई इस तरह,

आँखों में सुई सी चुभती रही.

जितना भी चाहा बाहर निकलना,

धागों में उतना उलझती रही.

51 टिप्‍पणियां:

  1. इसी का नाम जिन्दगी है, बाहर कैसे आयें इस उलझन से।

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  2. कविता में आपकी गहरी संवेदना, अनुभव और अंदाज़े बयां खुलकर प्रकट हुए हैं। इसकी बुनावट सलीक़ेदार, प्रखर और प्रभावी है।

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  3. बाखबर से बेखबर होती रही,
    समय की गठरी पलटती रही.
    रातों को उठकर जाने क्यों,
    मैं अपनी ही चादर सीती रही.
    संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
    फिर भी सीवन दिखती रही.

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  4. ज़िन्दगी के धागे की उलझन से बाहर आना बहुत मुश्किल है.

    बेहतरीन कविता.

    सादर

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  5. मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,
    अपनी ही बखिया उधडती रही,
    हाथों को मैंने बचाया बहुत,
    पर अंगुश्तानो से सिसकी निकलती रही.

    नमस्कार रचना दीक्षित जी| आपकी प्रस्तुतियां वाकई प्रभावित करती हैं| बधाई स्वीकार कीजिएगा|

    उत्तर देंहटाएं
  6. जीवन की डोर को धागों की डोर में पिरोकर बहुत बढ़िया रचना की सिलाई की है ।
    अति सुन्दर ।

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  7. जितना भी चाहा बाहर निकलना,
    धागों में उतना उलझती रही ...

    जिंदगी कुछ इस तरह ही होती है ... जितना सुलझाना चाहो ... उलझती ही जाती है ... टीस है आपकी रचना में ...

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  8. एक नारी की मनःस्थिति को नारी के जीवनबिम्बों की मदद से बहुत सुंदर बुना है आपने इस कविता में!!

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  9. जीवन की सच्‍चाई को उकेरती कविता। हार्दिक बधाई।

    ---------
    पति को वश में करने का उपाय।

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  10. मिलाना चाहा रिश्तों को जब,
    अपनी ही बखिया उधडती रही,

    आपकी कहन में साफगोई है.
    कोई बनावटीपन नहीं.
    ये दोनों बातें मुझे अच्छी लगीं

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  11. आदरणीय रचना दीक्षित जी
    नमस्कार !
    सच्‍चाई को उकेरती कविता।
    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  12. संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
    फिर भी सीवन दिखती रही.

    बहुत ही कुशलता से भावों को शाब्दों में उकेरा है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. जिंदगी के उधेड़ -बुन की कहानी कहती रचना /
    सुंदर

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  14. बेहद सुन्दर कविता रचना जी.

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत बिम्बों के माध्यम से आपने आपनी बात कही है। बहुत पसंद आई यह रचना।

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  16. जीवन की तमाम विसंगतियों को आपने एक सूत्र में पिरो दिया है . सुन्दर रचना . आभार

    उत्तर देंहटाएं
  17. बेहतरीन कविता....
    रचना जी यूँ ही लिखती रहे....

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  18. bahut sunderta se sui, dhaage, kadahi, taanke, turpan ityadi ka prayog kiya jo hatprabh kiye jata hai ki kya kamaal ki soch hai aapki.

    haan zindgi to yahi hai...fir bhi koshish karte rahna hi hamara karm hai.

    jabardast rachna. dhoop wali rachna bhi bahut acchhi thi..kshama chaahti hun teen baar padh kar bhi us par riv. dena rah gaya.

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  19. संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
    फिर भी सीवन दिखती रही.
    अति सुन्दर..........

    उत्तर देंहटाएं
  20. रचना जी,
    जीवन की संवेदना के धागों को आपने बहुत ही खूबसूरती से कविता में पिरोया है !
    सुराखों से छलनी हुई इस तरह,

    आँखों में सुई सी चुभती रही.

    जितना भी चाहा बाहर निकलना,

    धागों में उतना उलझती रही.
    हर पंक्ति से गहरी अभिव्यक्ति मुखरित हो रही है ,
    साधुवाद,
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  21. mn ki kash.m.kash ka
    apne-se shabdoN meiN
    sundar bakhaan ...
    abhivaadan .

    उत्तर देंहटाएं
  22. ख़ुशी औ ग़म के सलमे सितारों में,
    मैं ही जब तब टंकती रही.
    मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,
    अपनी ही बखिया उधडती रही, ......

    रिश्तों को पिरोने का नैसर्गिक गुण और अंतर्द्वंद को बहुत ही शालीनता से प्रस्तुत किया है

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  23. rachani ji,
    rishton k dhage ese hi hote hain....uljhane wale...bahut sundar rachana....dhanyawad
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  24. बाखबर से बेखबर होती रही,
    समय की गठरी पलटती रही.
    रातों को उठकर जाने क्यों,
    मैं अपनी ही चादर सीती रही.
    संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
    फिर भी सीवन दिखती रही.

    बहुत खूब कहा है आपने इस रचना में ..भावमय करते शब्‍द ।

    उत्तर देंहटाएं
  25. कविता लिखना कोई आपसे सीखे - आभार

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  26. कविता में प्रयुक्त बिम्ब एवं प्रतीको के लिए धन्यवाद ।

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  27. जितना भी चाहा बाहर निकलना,
    धागों में उतना उलझती रही ... !!!कौन निकल पाया है इससे !ये मामूली उलझन नही बड़े सोच समझ के उलझाया है ,उलझाने वाले ने !सनातन कसक भरी कविता के लिए बधाई !

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  28. Rachna Ji,

    apne naam ke anuroop aapne ek behtreen rachna ki hai..Congrats

    उत्तर देंहटाएं
  29. जितना भी चाहा बाहर निकलना,
    धागों में उतना उलझती रही ...
    sabse aakhri ki panktiya to is rachna ko samete huye hai .umda ,badhai lena meri taraf se .bhopal jaa rahi hoon aakar agli rachna par miloongi.

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  30. यही जीवन है ....रचना ! शुभकामनायें स्वीकारें !

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  31. अच्छी रचना .
    कभी समय मिले तो हमारे ब्लॉग//shiva12877.blogspot.com पर भी अपनी एक नज़र डालें .

    उत्तर देंहटाएं
  32. "सुराखों से छलनी हुई इस तरह,
    आँखों में सुई सी चुभती रही.
    जितना भी चाहा बाहर निकलना,
    धागों में उतना उलझती रही."

    बेहतरीन कविता
    कविता के भाव दिल को गहरे से छूते हैं
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  33. रचना जी, आज दुबारा कविता पढी, फिर से अच्‍छी लगी और कमेंट करने का जी चाहा।

    काश, हम जिंदगी को धागे की तरह आसानी से सुलझा पाते।

    ---------
    बोलने वाले पत्‍थर।
    सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

    उत्तर देंहटाएं
  34. जय श्री कृष्ण...आप बहुत अच्छा लिखतें हैं...वाकई.... आशा हैं आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....!!

    उत्तर देंहटाएं
  35. jindgi ko bahut khoobsoorti ke sath sila hai .badhai .mere blog ''vikhyat 'par aapka hardik swagat hai .

    उत्तर देंहटाएं
  36. रिश्तों में भले ही कितनी भी उलझने हो .....लेकिन आपकी कविता उलझनों की डिज़ाइनिंग जानती. ये टेक्सचर भी अच्छा है और पैटर्न भी :-)

    उत्तर देंहटाएं
  37. इसी उलझन में बीत जाता है जीवन..... बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

    उत्तर देंहटाएं
  38. सक्रांति ...लोहड़ी और पोंगल....हमारे प्यारे-प्यारे त्योंहारों की शुभकामनायें......सादर

    उत्तर देंहटाएं
  39. बाखबर से बेखबर होती रही,
    समय की गठरी पलटती रही.
    रातों को उठकर जाने क्यों,
    मैं अपनी ही चादर सीती रही.
    संस्कारों की कतरनें जोड़ी बहुत थीं,
    फिर भी सीवन दिखती रही.


    सवेदनशील ज़िन्दगी के सच को बयां करती हुई रचना -
    शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  40. संस्कारों की कतरने ,अपनों की झालर ,बातों की चुन्नट ,गम और खुशी के सलमे सितारे ..और अन्गुश्तानों से निकलती सिसकियाँ ....बहुत मन को छू जाने वाले बिम्बों से लिखी एक भावपूर्ण रचना...कितना ही निकलना चाहे इंसान इन धागों में उलझ ही जाता है ....
    मकर संक्रांति की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  41. बहुत सुन्दर लिखा है .. अपने तो रिश्तों को सिलाई से कितनी खूबसूरती के साथ सील दिया ...हर शब्द बेहतरीन ढंग से टांका है कविता में... .बहुत अच्छी पोस्ट है.. .. आज चर्चामंच पर आपकी पोस्ट है...आपका धन्यवाद ...मकर संक्रांति पर हार्दिक बधाई

    http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_14.html

    उत्तर देंहटाएं
  42. लोहड़ी और मकर संक्रांति की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  43. सुन्दर बिम्बो के माध्यम से ज़िन्दगी की सच्चाई दर्शाती एक बेहतरीन कविता बहुत कुछ कह गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  44. मिलाना चाहा रिश्तों को जब भी,
    अपनी ही बखिया उधडती रही, ...

    जिंदगी की उलझनों का बहुत सुन्दर चित्रण...लेकिन जिंदगी में उलझनें न हों तो सपाट जिंदगी जीने का क्या आनंद होगा. यह उलझनें ही आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं..बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

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  45. Only want to say your article is brilliant.

    उत्तर देंहटाएं

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