सोमवार, 16 नवंबर 2009

आज भी

आज भी



बचपन से, उनसे सुनती रही

एक माँ के न होने कि व्यथा

महसूस करती रही, उनकी ये वेदना

जो, कभी व्यथित कर देती थी मुझे भी

इससे भी ज्यादा व्यथित होती मैं

जब सुनती उनकी प्रभु से प्रार्थना

जो दुःख मुझ बिन माँ के बच्चे ने पाया

मेरे  बच्चे कभी न पायें

मेरे बच्चों से उनकी माँ कोई न छीनें
  
एक दिन ये सब कुछ बेमानी हो गया

जब मजबूर किया था उन्होंने ही

एक माँ को, उसके बच्चों से नाता तोड़ने को 

दुहाई दी थी, अपनी 

यानि उस माँ के सुहाग की 

लड़ती रही वो माँ

अपनी  ममता की लड़ाई

महसूस करती रही

अपनी छातियों में टीस

पर निशब्द  

ममता और सुहाग की जंग में

हार गयी एक दिन वो माँ

अपनी ममता की साँसे 

और अपने बच्चों के कांधों

 पर सज कर इस दुनिया से जाने का गौरव

आज भी उस माँ की याद में

 मैं परिंदों को उनका मनपसंद दाना खिलाती हूँ

और ढूँढती हूँ

 उनमें  उस अभागन  माँ को

शायद कभी कोई परिंदा मुझे देख कर

चहक उठे और मैं पढ़ लूँ 

उसकी आँखों में एक माँ होने का दर्द   





17 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे बच्चों से उनकी माँ कोई न छीनें
    gahree vedna hai

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  2. अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण रचना

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  3. आज भी... और सदा के लिए, खूबसूरत कविता.
    पिछला सप्ताह कहानी कि उधेड़बुन में बीत गया तो आपकी एक कविता छूट गयी है

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  4. सुहाग और ममता के बीच फंसी मां.
    अत्यंत संवेदनशील रचना.

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  5. marm ko chhoo liya aapne.......

    atyant komal aur hridya me sama jane wali kavita ...

    is kavita ke liye aapko badhaai !

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  6. आज भी उस माँ की याद में
    मैं परिंदों को उनका मनपसंद दाना खिलाती हूँ
    और ढूँढती हूँ
    उनमें उस अभागन माँ को
    शायद कभी कोई परिंदा मुझे देख कर
    चहक उठे और मैं पढ़ लूँ
    उसकी आँखों में एक माँ होने का दर्द

    वाह रचना जी बहुत ही लाजवाब रचना .....!!

    एक माँ के दर्द को बेहतरीन शब्दों में पिरोया है आपने ....बहुत खूब....!!

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  7. रचना जी
    स्त्री की पीड़ा और आँसुओं का इतिहास पुराना है . जब स्त्री की बात आती है तो प्रार्थनाएँ भी झूठी हो जाती हैं .

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  8. बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण रचना ......

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  9. bahut marmik rachna saath hi maa ki ahmiyat darshati hui ,uski kami mahsoos karati hui

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  10. एक दिन ये सब कुछ बेमानी हो गया

    जब मजबूर किया था उन्होंने ही

    एक माँ को, उसके बच्चों से नाता तोड़ने को !
    माँ होती है ..रचना !
    पिता ठहराया जाता है !!!
    माँ का दर्द कोई नहीं समझ सकता ! सुंदर लिखा है ...बधाई

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  11. maa vese hi ek marmik shabd hai ek aeisa tilism jo kabhi mukt nahin hone deta ...jisse ham chahkar bhikt nahin ho sakte... bhut badhiya rachna..

    Aur ek khas bat jo photo aapne sath mein lagaya hai bheega hua, pattharon par pada hua jasvant ka murjhaya hua galta hua phool...oh ak atirikt vedhak kavita hai..uske liye alag se badhaiyan...

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  12. माँ को खोने के गम से बड़ा कोई दर्द नहीं है ..आपने उस को बखूबी अपने लफ़्ज़ों में समेटा है

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  13. धन्यवाद रचना जी,
    आप न लिखतीं तो शायद मैं इससे वंचित ही रह जाता..
    लोगों के कथनी और करनी में कितना फर्क होता है
    माँ न होने का दर्द
    और माँ के होते हुए भी, माँ के छिन जाने का दर्द..
    दोनों में बहुत फर्क है
    कहते हैं पाप कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ता...
    कविता का बड़ा ही दर्द भरा अंत पढ़ने को मिला
    -शायद कभी कोई परिंदा मुझे देख कर
    चहक उठे और मैं पढ़ लूँ
    उसकी आँखों में एक माँ होने का दर्द।
    -आँखों में तो अपनी ही परछाईं दिखती है रचना जी!

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  14. सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं.
    आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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