रविवार, 6 जून 2010

जीवाश्म

जीवाश्म



संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल अनुमान मिले हैं


गूंज रहे इस शाद्वल में


प्रणय के कुछ गान मिले हैं


पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों पर


अपने कुछ वृत्तांत मिले हैं


हिमखंडों के भीतर बाहर


तेरे मेरे नाम मिले हैं


अपनी भंगुर सांसों की माला के,


मनके सुबहो शाम मिले हैं


हर जीवन में तुझको माँगा


पर अश्रु के अनुदान मिले हैं


मेरे नयन व्यथा से गीले


घाटी के उस पार मिले हैं


अधर सधर के बीच फंसे


मेरी सांसों के सारांश मिले हैं


जाने कितनी सदियाँ बीतीं


जाने कैसे रतियाँ बीतीं


तब जा करके तुमको, मेरी


आँखों, सांसों औ बातों के


ये सारे जीवाश्म मिले हैं


संकेत, सूत्र औ संरचना


इंगित करते हैं जिस रचना को


उसके कल जीवाश्म मिले हैं.

31 टिप्‍पणियां:

  1. आज की दुनिया का कटु शाश्वत वास्तविक सत्य ..

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  2. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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  3. "हिमखंडों के भीतर बाहर
    तेरे मेरे नाम मिले हैं
    अपनी भंगुर सांसों की माला के,
    मनके सुबहो शाम मिले हैं"
    आपकी कृतियों में निराली सोच और गहरे भाव होते हैं उसी का एक और सबूत है "जीवाश्म" - बेमिशाल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  4. "हिमखंडों के भीतर बाहर
    तेरे मेरे नाम मिले हैं
    अपनी भंगुर सांसों की माला के,
    मनके सुबहो शाम मिले हैं"
    आपकी कृतियों में निराली सोच और गहरे भाव होते हैं उसी का एक और सबूत है "जीवाश्म" - बेमिशाल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  5. "हिमखंडों के भीतर बाहर
    तेरे मेरे नाम मिले हैं
    अपनी भंगुर सांसों की माला के,
    मनके सुबहो शाम मिले हैं"
    आपकी कृतियों में निराली सोच और गहरे भाव होते हैं उसी का एक और सबूत है "जीवाश्म" - बेमिशाल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. Aah ! Padhke na jane manme kya,kya ghumad aayaa...dard se sarabor,sachhayi darshati,anoothi rachna..man bhar aaya..

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  7. पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों पर

    अपने कुछ वृत्तांत मिले हैं

    हिमखंडों के भीतर बाहर

    तेरे मेरे नाम मिले हैं ,

    बहुत बेहतरीन प्रस्तुति.....बहुत खूबसूरती से संजोया है भावनाओं को...

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  8. बहुत सुंदर व भावपूर्ण रचना....

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  9. is tarah ki anokhi rachna ,rachna hi likh sakti hai 'jivashm 'ye shabd hi prabhavshaali hai kafi jo apni taraf hame khinchhta hai .ati uttam .

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  10. Hi..

    Himkhandon ke bheetar-bahar..
    Tere-mere naam mile hain..

    Wah kavita ne man moh liya..

    'Rachna' ki rachna main humko..
    Pyaar ke kuchh jeevansh mile hai..
    Janm-janm ki preet ho jaise..
    Aise kuchh pariman mile hain.

    DEEPAK..

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  11. रचना जी , हमारी भी तारीफ स्वीकार करें ।
    आप इतना गूढ़ लिखती हैं , कभी कभी बहुत सोचने पर भी समझना मुश्किल सा लगता है ।

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  12. डॉक्टर साहब,
    ऐसा तो कुछ बहुत गूढ़ नहीं लगा मुझे, पर शायद मेरी रचना हो तो मुझे ऐसा महसूस न हुआ हो. एक दो शब्द क्लिष्ट हैं जिनका मै अंग्रेजी मैं अनुवाद दे रही हूँ. शाद्वल = Meadow ( घास का मैदान ), जीवाश्म = Fossil.

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  13. Aaj main soch ke aaya tha, samajh ke hi rahunga Rachna ji ki Rachna!
    Zor lagane pe paaya, mera dimag bhi kaam karta hai.... It works!!!

    Aur haan, abhi tak ye baadal banjaara hi hai.....
    Bandha to soochit avashya karunga!
    Ashish dijiye!

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  14. "गूंज रहे इस शाद्वल में
    प्रणय के कुछ गान मिले हैं
    पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों पर
    अपने कुछ वृत्तांत मिले हैं
    हिमखंडों के भीतर बाहर
    तेरे मेरे नाम मिले हैं "
    रचना जी आपकी अब तक सबसे सुंदर रचना. इसके शब्द इतने मधुर हैं कि मैं तो इन्हें गुनगुना भी रहा हू... "गूंज रहे इस शाद्वल में
    प्रणय के कुछ गान मिले हैं "... नया बिम्ब गढ़ा है आपने... जैसे "प्रणय के गान , अपने कुछ व्रतांत, हिमखंडो के भीतर बाहर आदि आदि " पूरी मानवता की कविता है यह... आपने इक नए संसार की रचना कि है इस कविता के माध्यम से.. जीवाश्म शीर्षक बहुत उम्दा है

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  15. सही मायने में यह है कविता...
    मन प्रसन्न हो गया पढ़कर.......

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  16. संकेत, सूत्र औ संरचना
    इंगित करते हैं जिस रचना को
    उसके कल जीवाश्म मिले हैं.

    मतलब सदियों पुरानी दास्ताँ है. ये रचना सृष्टि में घुल मिल गया है. आपकी एक बहुत सुन्दर कविता से आज परिचित हुआ.

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  17. हर जीवन में तुझको माँगा



    पर अश्रु के अनुदान मिले हैं



    behd khubsurat rachna .sundr shbdo aur bhavo ka snyojan .

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  18. हिमखंडों के भीतर बाहर
    तेरे मेरे नाम मिले हैं
    अपनी भंगुर सांसों की माला के,
    मनके सुबहो शाम मिले हैं"
    भावपूर्ण रचना....

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  19. जाने कितनी सदियाँ बीतीं
    जाने कैसे रतियाँ बीतीं
    तब जा करके तुमको, मेरी
    आँखों, सांसों औ बातों के
    ये सारे जीवाश्म मिले हैं ..

    कुछ विज्ञान कुछ मनोविज्ञान ... कुछ भावनाएँ .. कुछ संवेदनाएँ ... सब मिल कर इस रचना का निर्माण कर रहे हैं ... अच्छी रचना ...

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  20. वाह! बहुत अच्छी कविता. ..बधाई.

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  21. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

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  22. सच में कमाल का लिखा है आपने! शीर्षक से वैज्ञानिक कविता का आभास होता है....आपने बहुत ही सुन्दरता से शब्दों को सजाया है....इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई

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  23. बेहतरीन रचना---आपके नाम को सार्थक बनाती हुयी।

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  24. अधर सधर के बीच फंसे
    मेरी सांसों के सारांश मिले हैं

    बहुत सुंदर कविता.

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  25. कविता बहुत अच्छी लगी.जीवश्म शब्द का आपने जिस संदर्भ मे जिस तरह अनूठा प्रयोग किया है
    वह प्रंशंसनीय है.

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  26. बहुत-बहुत शुक्रिया
    धुंआ ,जीवाश्म ,लक्षमण रेखा ,दरख़्त...........वाह . .

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