रविवार, 13 दिसंबर 2009

दरारें

दरारें




पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं
अब दरारों में रिश्ते रहते हैं
पहले दरारों को हम सीते थे
आज उन्हीं दरारों में हम जीते हैं
कभी ये रिश्ते धरोहर की तरह संजोये जाते थे
आज सिर्फ दिखाने को ढोए जाते हैं
कभी ये रिश्ते चाशनी से मीठे
आज के रिश्ते ख़मीर से खट्टे
देखने में उपर से मजबूत
नीचे बेज़ार, बेदम,खोखले
आज रिश्तों का दम घुटने लगा है
इन दरारों में पनपने की जगह ही कहाँ है 
ऐ इंसान जागो
इन रिश्तों को आज़ाद करो
इन्हें खुली हवा चाहिए
इन्हें संभलने को कुछ वक़्त चाहिए
रिश्तों में चाशनी नहीं
चाशनी को बहने को
दिल में कुछ जगह चाहिए


(3XQ93BBGWCVP) 

27 टिप्‍पणियां:

  1. पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं
    अब दरारों में रिश्ते रहते हैं
    bahut khoob.........kya baat kah di.

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  2. आज रिश्तों का दम घुटने लगा है ....बिलकुल सही आपने.... बहुत अच्छी और सार्थक कविता....

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  3. बहुत सही कहा आपने।बढ़िया रचना है।बधाई।

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  4. नपी - तुली, सत्यपरक - प्रशंसनीय रचना, बधाई स्वीकारें - राकेश कौशिक

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  5. aaj ke dour ki ek sachaai ko ughaadti

    shreshth kavita

    __abhinandan aapka !

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  6. "Aaaj bhee" to abhi nahee padhee..lekin is rachnaa ne aur saath diye chitr ne nishabd kar diya!

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  7. पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं
    अब दरारों में रिश्ते रहते हैं..

    वाह क्या बात लिखी है .......... सत्य ........ रिश्तों को जीना जीवन जीने की तरह होता है ......... रिश्तों को सॅंजो कर रखना चाहिए .......... अच्छी रचना ,..........

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  8. बात तो सही है।
    आजकल रिश्ते नाममात्र को रह गए हैं।
    तस्वीर बहुत अच्छी है।

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  9. शब्दों का स्थान बदल दो तो मायने बदल जाते हैं ....सुना था ....आज देखा तो जाना .....

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  10. पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं
    अब दरारों में रिश्ते रहते हैं
    पहले दरारों को हम सीते थे
    आज उन्हीं दरारों में हम जीते हैं
    --इन पंक्तियों की जितनी भी तारीफ की जाय कम है
    और हाँ मैं इस कविता में पोस्ट चित्र को बहुत देर तक देख हक्का बक्का रह गया...
    वाह! क्या बात हैं।

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  11. अच्छी ..रचना ..रिश्तों के मायने तलाशती हुई

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  12. रचना जी बहुत दुखती और सुलगती रग पे कलम रख दी आपने .....!!

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. रचना जी ,(दरारें)
    समझ नहीं आता आपके फोटोग्राफ को दाद दूं या कविता की गहराई में डूब जाऊं? यह फोटो और उसे इस तरह सहेजना ! मैं बस चित्रलिखित हूं। आप फोटोग्राफर हैं सूक्ष्मतम दृष्टिसम्पन्न या गहन रचनाधर्मी .... पेड़ है यह या ठूंठ होकर सूली पर चढ़ी कोई स्त्री ?

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  15. पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं
    अब दरारों में रिश्ते रहते हैं, बहुत ही भावमय प्रस्‍तुति ।

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  16. चित्र देखकर तो कुछ पल उसकी दरारों को, उसकी आकृति में ही ना जाने दृश्‍य आंखों को भ्रमित कर रहे थे, बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  17. Jaan hai aapki shabdo men..
    sachmuch aajka rishta kuchh aisa hi hogaya hai...tasvir bahut pyari hai..!

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  18. afsos hua bahut is rachna par tippani daal gayi rahi magar aaj nahi dekhti to samjh nahi aata ,rishton ki aapsi dararo pe aapne bahut hi sundar likha hai jo sarahniye hai

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  19. बहुत ही सुंदर रचना है। ब्लाग जगत में द्वीपांतर परिवार आपका स्वागत करता है।
    pls visit....
    www.dweepanter.blogspot.com

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  20. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  21. आज कल कुछ ज्यादा चलन में है ये चासनी....

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  22. Thnx for making me read such a wonderful poem...n for commenting on my blog... aur m yahin hu, bas dilli se ulajh rahi hu...

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  23. DARAREIN bahut sundar rachna hai 4th line mein DARARON aur HUM ki jaroorat nahin thee isi tarz par is rachna ko edit karke dekhiye kavita nikal aayegi kavita mein shabd ke dohrav se bachna chahiye aur baat ko sanket mein rakhna hota hai ... lekin is rachna ke madyam se jo aap kahna chah rahi hain vah bahut mahatvpoorn hai RISHTON KO AAZAD KARO INHEIN KHULI HAWA CHAHIYE..

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  24. बहुत उम्दा।नव वर्ष की बहुत- बहुत शुभकामनायें ।

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  25. अच्छी ..रचना ..रिश्तों के मायने तलाशती हुई

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