रविवार, 27 जून 2010

भाव शून्य

"भाव शून्य"






वो बहुत खुश थी

बरसों से प्रतीक्षारत थी,

जिस ख़ुशी के लिए

वो उसे मिल जो गयी थी.

जीवन में एक पूर्णता,

एक सम्पूर्ण नारीत्व,

एक अजीब सी हलचल,

उत्साह और..

पूरी देह में सिहरन

पर न जाने क्यों,

उस सम्पूर्ण नारीत्व को देखने की चाह,

उसमें जाग उठी.

फिर क्या था,

एक कमरा तार मशीनें और

कुछ चहलकदमी.

अचानक कुछ हलचल हुई.

नेह के ताल में एक नन्ही सी जान.

गालों में गहरे गड्ढे,

एक शांत सौम्य मुस्कान.

फिर एक अंगडाई,

पांव लम्बे खिंचे,

दूर तक जाते हाँथ,

घूमता शरीर,

फिर वही शांत सौम्य मुस्कान.

उसी पल पाया उसने.

अपनी देह में, नन्हे पांवों का कोमल स्पर्श,

कोहनिओं की हड्डियों की मीठी चुभन.

खो जाना चाहती थी वो उसमें

पर हैरान थी वो !!!!

न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे

अचानक भाव शून्य हो गए थे ...

 
 
 

34 टिप्‍पणियां:

  1. ढका हुआ एक सच कहने की क्षमता है इस कविता में...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  2. Aah...na jane log kyon aisa bartaav karte hain...kisee ke janm pe bhav shoony ban jate hain..

    उत्तर देंहटाएं
  3. उसी पल पाया उसने.
    अपनी देह में, नन्हे पांवों का कोमल स्पर्श,
    कोहनिओं की हड्डियों की मीठी चुभन.
    खो जाना चाहती थी वो उसमें
    पर हैरान थी वो !!!!
    न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे
    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...
    is khoobsurat ahsaas me bhay....
    aadmi saham hi jaayega .sundar bahut sundar rachna hai .

    उत्तर देंहटाएं
  4. रचना जी! कविता की पूरी गत्यात्मकता आनंद की एक असीम ऊँचाई पर ले जाती है. और अंतिम पंक्तियों में जाकर आपने जो चोट की है, वह दिल को कचोटती है... पता नहीं कब समाप्त होगा यह सिलसिला...

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  5. न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे
    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...
    इन पंक्तियों ने कल्पना में उड़ते मन को धरातल पर ला दिया...इस कडवी सच्चाई को शब्दों में अच्छी तरह बाँधा है..

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर हैरान थी वो !!!!

    न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे

    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...

    katu..niboli ka sa swad ban aaya... satya kavita..achchhi lagi

    उत्तर देंहटाएं
  7. न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे
    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...

    logoN ke chehre bhale bhav-shunya ho gaye hoN par aaj aisi kaviyitrioN ki saNkhya badh rahi hai jinke chehre aise avsaroN par bhav-vibhor ho jate haiN. ye bhi to kuchh kam aashajanak nahiN hai. badhayi.

    उत्तर देंहटाएं
  8. अपनी देह में, नन्हे पांवों का कोमल स्पर्श,

    कोहनिओं की हड्डियों की मीठी चुभन.

    खो जाना चाहती थी वो उसमें

    पर हैरान थी वो !!!!

    न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे

    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...
    ओह कितनी मार्मिक हो गयी अन्त मे
    अपनी देह में, नन्हे पांवों का कोमल स्पर्श,

    कोहनिओं की हड्डियों की मीठी चुभन.

    खो जाना चाहती थी वो उसमें

    पर हैरान थी वो !!!!

    न जाने क्यों पास बैठे लोगों के चेहरे

    अचानक भाव शून्य हो गए थे ...
    एक नन्ही जान को जन्म लेने से पहले ही शायद मार देने की तयारी थी लाजवाब रचना बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. बड़ी सहजता से भाव शून्य चेहरों को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है आपने. बहुत अच्छी व् सार्थक कविता.

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  10. दुनिया दारी इस कदर छा गई है की हमारी सहज सम्वेदनाएँ भी भौचकी रह जाती हैं ! कैसा कठिन समय है ! इस तडप से रूबरू करने के लिए धन्यवाद !

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  11. lajawaab ji.....dil ko kachotne wali panktiyaa.....

    kunwar ji,

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  12. भाव शून्य होने की वजह...क्या नन्ही सी जान का बेटी होना स्तब्धता का कारण बन गया?...बहुत गहराई है इस कविता में... रचनाजी की अति सुंदर रचना!

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  13. बहुत सुन्दर रचना, खास कर अंत में जिस तरह से आपने ये जता दिया .. कि आज भी भारतीय समाज में दकियानूसी विचार किस कदर हावी है !
    आपके शुभकामनाओ के लिए शुक्रिया !

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  14. बात कहने का तरीका कोई आपसे सीखे - इतनी बड़ी तथा गहरी बात और कितनी शालीनता से. तस्वीर का कविता के साथ सामंजस्य - गजब - आभार.

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  15. रत के हिस्से तो जन्म से पहले ही दुःख लिख दिए जाते हैं .....

    बहुत ही मार्मिक रचना ....
    वह सच्चाई जो शायद हर स्त्री एक न एक बार महसूस करती है माँ बनते वक़्त .....!!

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  16. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बेहतरीन ।

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  17. bahut hi sachhai ke sath smaz ke pakhnd ko samne rakh diya .
    sashkt abhivykti

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  18. कड़वा सच कहती यह रचना दिल को छू जाने के साथ साथ सोचने को विवश करती है !

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  19. AAPKEE KAVITA MEIN BHAVYATAA HAI.
    MEREE SHUBH KAAMNA AUR BADHAAEE
    SWEEKAR KIJIYEGA.

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  20. itne sunder ahsaso me khote hue bhee bhav shoonyta dhyan bhang kar gayee........
    bahut asar chod gayee aapkee ye rachana........

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  21. रचना जी,
    नमस्ते!
    क्या पता चल गया था के कोख में फूल नहीं कलि पल रही है!? मार्मिक!
    आशीष नाम की पिछली रचना भी पढ़ी..... सूरज नहीं चाँद बनने का आशीष! गहन!
    आशीष:)
    ---------------------------
    इट्स टफ टू बी ए बैचलर!

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  22. सभी को नचाया,

    इशारे पे अपने


    पर शायद

    समय को नचाना न आया.
    Wah! Kya baat hai..samay,samay aur samay ki baat hai!

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  23. वास्तविकता को प्रस्तुत करना भी एक कला है!....सुंदर रचना!

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  24. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ ही एक सशक्त सन्देश भी है इस रचना में।

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  25. बहुत गहराई है इस कविता में... रचनाजी की अति सुंदर रचना!

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  26. आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ, क्षमा चाहूँगा,

    उत्तर देंहटाएं
  27. कई चेहरे वाकई कितने किताबी होते हैं कि हर सफ्हे से आगे बढ़ जाने को साहस की जरुरत होती है. बढ़िया कविता.

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