शनिवार, 23 मई 2015

ख्वाब और ख़ामोशी

ख्वाब और ख़ामोशी 

उजाले रोशनी से मिल,
धूप में घुल मिल जो गये.
बेहद नाजुक कुछ ख्वाब हमारे,
होश के आगोश में बेहोश हो गये. 
भूख की फसल उगी ही थी अभी,
वो आ के जुबाँ पे चरस बो गये.
मौत भी इस कदर मिली हमसे,
कांपते  कांपते खंजर भी रो गये.
आवाज़  निकली भी तो ऐसे,
ज्यों चीख के पाँव खो गये.
धड़कने थम गई जब हमारी, 
हम साँसों के सहारे हो गये.
अंधियारे ओढ़ सियाही की चादर, 
अमावस के चाँद हो गये.
सन्नाटे की सतह पर तब,
गुमनाम ख़ामोशी के लब  खो गये.

रविवार, 17 मई 2015

जीवन और आशा

जीवन और आशा 
 (१)
जीवन है तो गति है 
गति है तो घर्षण है 
घर्षण है तो संघर्ष है
संघर्ष है तो शुष्कता है 
शुष्कता है तो भंगुरता है 
कुछ चिर परिचित से 
नहीं लगते ये शब्द
अगर हाँ तो क्या 
ये जीवन है 
ये संबंध है 
ये रिश्ते हैं 
या ये रिसते हैं 

(२)
जीवन है तो गति है 
गति है तो घर्षण है 
घर्षण है तो ऊष्मा है 
ऊष्मा है तो उर्जा है 
उर्जा है तो 
उर्जावान पंचतत्व 
पंचतत्व है तो आरंभ है 
आरंभ है तो अंत है 
अंत है तो 
नए जीवन की आशा है 
आशा है तो जीवन है 

रविवार, 10 मई 2015

स्त्री

स्त्री 
नम्रता, विनम्रता आभूषण है स्त्रिओं के 
स्त्री हूँ, सो लोभ संवरण न कर सकी.
अपने से बड़ों ने बुरा किया 
या सोचा मेरे लिए,
समझा आशीर्वाद, 
रख लिया सर माथे पर.
छोटों ने कहा कुछ भी,
अबोध है, नासमझ हैं...
समझा लिया मन को. 
कहते हैं पेड़ में फूल लगें,
तो झुक जाता है.
लगे फल 
तो झुक कर दोहरा हो जाता है.
कितना झुकूँ , 
कितना झुकूँ , 
कितना झुकूँ , 
कई बार निकल जाती है
चीख भी हल्की सी,
और कितना झुकोगी,
बस भी करो अब 
नहीं जानती रीढ़, बिना रीढ़
और दोहरी रीढ़ का मतलब,
फिर भी सोचती हूँ 
बिना रीढ़ वालों  से 
दोहरी रीढ़ वाली मैं भली.

रविवार, 3 मई 2015

प्रतिभाएँ

प्रतिभाएँ

जानती हूँ मैं एक 
आदरणीय, परम पूज्यनीय,    
वन्दनीय, प्रातः स्मरणीय 
व्यक्ति को. 
लिखी हैं जिन्होंने हिन्दी संस्कृत में पुस्तकें. 
जीवन के अस्सी दशक बाद आज भी 
वही तेवर, वही मधुर मुस्कान 
आज भी गर्व है जिन्हें अपनी 
एक सम्मानित उपलब्धि ला पर.
पूरे जीवन जो मिला अच्छा लगा ले लिया.
किसी ने प्यार से दिया, भय से दिया,
बेमन से दिया, पर ला पढ़े हैं तो लेना ही है 
कभी ला पर दा भारी पड़ा,
तो दे दिया घर के दो एक लोगों को घर निकाला.
जी नहीं भरा तो, किसी को दुनिया से निकाला. 
कोई नहीं पूछता उन्हें अब 
घर परिवार आस पड़ोस में.  
आज घर में है एक बेटा 
जूझ रहा जिंदगी और मौत से 
खाने के लाले है 
दो समय की रोटी,
बेटे की फीस, पति के स्वास्थ्य के नाम पर, 
बहू ने रखा घर से बाहर कदम ज्यों ही
नहीं खाते वो उसका बनाया कुछ भी.
नहीं जाते रसोई में वो कभी 
वैसे भी रसोई के काम में हाथ तंग है उनका 
पर जेब तंग नहीं.
अपनी और अपनी पत्नी की पेंशन जो है.
खाए जाते हैं रोज काजू बादाम, छोले भठूरे 
कच्चा दूध जो भी बाजार से मिल जाये.
साथ में रहते दूसरे लोग कर रहे हैं जद्दोजहद.   
पर उनकी आज भी गर्दन तनी और छाती चौड़ी.
सोचती हूँ, लिखू कुछ नयी परिभाषाएं, 
निष्ठुरता, अमानवीयता, द्वेष, क्रोध, दंभ
की पराकाष्ठा से परे भी एक पराकाष्ठा है.
विरले ही विचरते हैं जिसमें
और आज मैं भारी मन से
सबके सामने यह स्वीकार करना चाहती हूँ
कि मैं ऐसे किसी इंसान को 
जानने पहचानने से इनकार करती हूँ.

रविवार, 26 अप्रैल 2015

इसे निमंत्रण न कहो

इसे निमंत्रण न कहो

कुछ दिन पहले एक विवाह निमंत्रण ने झकझोर दिया. न इसे पढकर न इसे देखकर लगा कि यह निमंत्रणपत्र है. यह समाचार पत्र में छपे किसी समाचार की तरह एक पैराग्राफ मात्र था.

पूर्व पुलिस निदेशक की पुत्री आई ऐ एस अधिकारी और नेत्र विशेषज्ञा की पुत्री, जिसने भारत के एक प्रतिष्ठित संस्थान से डिग्री ली है, का विवाह आई एफ एस  अधिकारी के पुत्र , जो भारतीय राजस्व सेवा में सहायक आयुक्त है, से हो रहा है. उक्त अवसर पर प्रीतिभोज में सम्मिलित हों. दर्शनाभिलाषी मात्र पति और पत्नी. 

ना विवाह में सम्मिलित होने का आग्रह ना कार्यक्रमों की कोई जानकारी. मन आहत  हुआ और यह कविता बनी.
इसे निमंत्रण न कहो
 
मैं अपनों की सफलता को 
अखबार करती क्यूँ फिरूं 
जताने को ये बहुत 
मेरी निगाहे नूर है
 
हो सको मौन दो पल तो कहो 
पर इसे निमंत्रण न कहो
 
तुम पर सिमट कर गई 
ये निरी दुनिया तुम्हारी 
रिश्तों का ये ह्रास है 
ये निरा उपहास है
 
कुछ विनम्रता ला सको तो कहो  
पर इसे निमंत्रण न कहो
 
नेत्र विशेषज्ञा हो तुम सब जानते हैं 
आँखों में टांके रोज  कितने ही लगाती 
उधड़े हुए रिश्तों की सीवन कभी झांक पाती 
रिसते लहू के आईने को ताक पाती

सुई में रिश्ते पिरो लो तो कहो 
पर इसे निमंत्रण न कहो

कुछ खोजती कुछ ढूंढती बिसरी कहीं 
छोटी कहीं मोटी कहीं धुंधली कहीं 
नमक की खेती लिये, गीली कहीं सीली कहीं   
बेनूर आँखों में कभी, झांकती हो 
 
बेवजह खारा कभी आंख का पानी पिया हो तो कहो 
पर इसे निमंत्रण न कहो

लाडली को कुटुंब की  
उपलब्धियों में तौलती 
अप्रत्याशित प्यार में कभी 
देखा कभी तौला कभी है
 
मुस्कुराहट पर कभी निहाल हो तो कहो 
पर इसे निमंत्रण न कहो
 
कुर्सी ही जिंदगी है जानते हैं 
उसके भी पाए तुमको पहचानते हैं 
पर अंत समय चार कांधे ही तानते हैं 
मुझे भी बहुत से कांधे मानते हैं
 
उपलब्धियों के चारों कांधों को टटोलो तो कहो 
पर इसे निमंत्रण न कहो

करबद्ध प्रार्थना है
 
इसे  अपने कुटुंब कि उपलब्धियों का चित्रण कहो 
अपनों के ही बीच का मंत्रण कहो 
बेवजह रेवड़ी वितरण कहो 
पर इसे निमंत्रण ना कहो   
पर इसे निमंत्रण न कहो.

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

श्री गणेश

श्री गणेश
कहते हैं लोग, 
करती हूँ मैं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन 
भली भांति. 
हर परीक्षा में उत्तीर्ण होने का भरसक प्रयास 
कठिन परिस्थितियों में संयम
शायद इसीलिए भगवान ने दी मुझे दो बेटियां.
सोचने लगी 
पति और पुत्र के दीर्घायु व स्वस्थ्य जीवन के लिए हैं
अनगिनत व्रत उत्सव और त्यौहार 
पर केवल 
बेटियों के लिए कुछ भी नहीं 
फिर क्या था 
होने लगा घर में हर दिन उत्सव 
हर दिन बेटियों के नाम 
नहीं पाला बेटियों को बेटों कि तरह कभी 
नहीं कहा मेरी बेटियां ही मेरा बेटा हैं 
आखिर बेटी तो बेटी ही है ना 
अब मुझे भी विश्वास हो चला है 
सच कहते हैं लोग 
मैं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन 
पूरे समर्पण से करती हूँ 
मेरे विवाह के पूरे अट्ठाईस वर्ष बाद 
३ नवंबर को मुझे प्राप्ति हुई 
पुत्र रत्न की 
प्रसन्नता,पीड़ा, प्रसव पीड़ा
कुछ भी अप्रत्याशित ना था.
फिर क्या था 
मैंने पहली बार 
अपने पुत्र के दीर्घायु व स्वस्थ जीवन के लिए रखा 
सकट चौथ का व्रत
जी हाँ 
मैंने अपने जमाता के लिए रखा सकट चौथ का व्रत. 

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

ख्वाब

ख्वाब
 
झलती रही पंखा साँझ सारी शाम,
रात बोझिल हुई चुप चाप सो गई.

मुंह ढांप के कुहासे की चादर से,
हवा गुमनाम जाने किसकी हो गई.
 
चाँद ने ली करवट बांहों में थी चांदनी,

रूठी छूटी छिटकी ठिठकी वो गई.
 
बदली के आंचल की उलझने की हठ,

आकाश की कलँगी भिगो गई.

बादल के बाहुपाश में आ कर दामिनी,
मन के सारे गिले शिकवे भी धो गई.
 
राग ने रागिनी को धीमे से जो छुआ,
वो बही बह के कानों में खो गई.

आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.
 
  सज संवर के पंखुरियों पे बैठी थीं जो,
आज वो ओस की बूंदें भी रो गईं.

मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई.

रविवार, 25 अगस्त 2013

राजनीति इधर भी

राजनीति इधर भी

कभी अकड़ती इतराती
भाव खाती कोई सब्जी
अचानक बेचारी हो जाती
जब दूसरी दो चार सब्जियाँ
लजाती लड़खड़ाती गिर पड़ती,
हम उसे थाम लेते 
बस जाती वो
हमारी आँखों में
संकटमोचन बन,
पर अब वो बात नहीं
इसके पहले कि 
उपयुक्त समय जान
कोई लजाये, लड़खड़ाये, गिर पड़े.
भाव खाती सब्जी
सबको सहारा दे 
उठाती है अपने साथ.
ऊपर से देखने में
अलग अलग दल
श्रेणियाँ हैं इनकी
अब अंदर सब एक हैं
सब्जी का राजा आलू
गृह मंत्री टमाटर
वित्त मंत्री प्याज
फलों के शहंशाह आम
करते हैं मंत्रणा
एक वातानुकूलित कक्ष में
और पल भर में ही
गरीबी रेखा पर 
झूलता मेरा संसार
मेरा चूल्हा, चौका
कुपोषण के शिकार
साग भाजी को 
तकते मेरे बर्तन    
आ जाते हैं 
गरीबी रेखा के ऊपर
जानना चाहती हूँ
साग भाजी में राजनीति है
या राजनीति में साग भाजी
या हर साँस हर आस में राजनीति. 

रविवार, 11 अगस्त 2013

दस्तक

दस्तक 

 रोती बिलखती हर गली मोहल्ले में,
सांकल अपना पुराना घर ढूंढती है.

सजी थी कभी मांग में जिसकी,
वो चौखट वो दीवार ओ दर ढूंढती है.

डाले बांहों में बांहे, किवाड़े किवडियाँ,
आज भी अपना वो घर ढूंढती हैं.

जहाँ छत ओ मुंडेरें थी सखी सहेली, 
आंगन पनाले वाला घर ढूंढती हैं.

छोटे ओ गहरे घरों की लंबी कतारे,
अपना पुराना शहर ढूंढती हैं.

थकी हारी टूटी हुई दस्तक, 
खुले दरों वाला घर, शहर ढूंढती है.

रविवार, 7 जुलाई 2013

कभी यूँ भी ..

कभी यूँ भी ..

मेरे शहर का एक 
पांच सितारा होटल 
कागज का टपकता 
चाय का कप 
उसे सहारा देने को 
लगाया गया एक और कप 
दुबली पतली काली निरीह 
जाने कैसी चा..य ..
यूँ लगा उसे पानी कह कर पुकारूँ 
अगले ही पल सोचा 
पानी की इस तंगी में 
कल के अखबार की 
सुर्खियाँ ना बन जाए  
"पानी की आत्महत्या"
ढूंढती हूँ कप में चाय 
समझने लगती हूँ 
उसका दर्द  
कभी सजी संवरी सी रहने वाली वो 
दूध के दो छींटों बाद भी 
रोती बिलखती वो विधवा 
चाय और कॉफी
झांकती हूँ उसके कप में
उसे विधवा कहूँ, विधुर कहूँ 
क्या कहूँ, कुछ न कहूँ  
मेरे शहर का एक 
पांच सितारा होटल 
 
 
[५ जुलाई २०१३पुरानी दिल्ली का ओबेरॉय मैडेन  पांच सितारा होटल एक आयोजन जिसमे भाग लेने के लिए भरे थे मैंने ४६०००रूपये ]
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