रविवार, 27 सितंबर 2015

रिश्तों में जीवन

रिश्तों में जीवन 

भूकंप में नहीं गिरते घर 
गिरते हैं मकान
मकान ही नहीं गिरते
गिरती हैं उनकी छतें
छतें भी यूँ ही नहीं गिरती
गिरती हैं दीवारें
गिरातीं हैं अपने साथ छतें
फिर अलग अलग घरों के
बचे खुचे जीवित लोग
मिल कर बनाते हैं
पहले से कहीं अधिक
मजबूत दीवारों वाले मकान
फिर बनाते है घर
होते हैं तैयार
आने वाली किसी
आपदा विपदा के लिए
आओ सीखें
भूकंप और भूकंप पीडितों से कुछ
सजाएँ संभालें पिरोयें जीवंत करें
भूले बिसरे टूटे
अमान्य, मृतप्राय
रिश्तों को.

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-09-2015) को "बढ़ते पंडाल घटती श्रद्धा" (चर्चा अंक-2112) (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    अनन्त चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 29 सितम्बर 2015को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. मकान तो दूबारा बन सकते है लेकिन टुटे रिश्तों को दूबारा सहेजना थोडा मुश्किल ही होता है। सुंदर रचना...

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  4. रिश्तों में कंपन हो तो वे चटखने लगते हैं।
    अच्छा संदेश ।

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  5. बहुत सुंदर..आशा जगाती पंक्तियाँ..प्रेम के लिए कुछ भी असम्भव नहीं..

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  6. टूटे हए रिश्तों के बाद कहाँ मजबूत हो पाती हैं दीवारें ... रिश्तों में साँसे होती हैं खाली ईंट गारा नहीं ...

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  7. टूटने के बाद भी रिश्तो में कुछ सांसे बची होती है.. चाहो तो फिर जुड़ सकते है बहुत सुन्दर भाव

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  8. रिश्तों की दीवारों पर खड़े घर कभी नहीं गिरते..केवल मकान ही ढह जाते हलके से भूकंप से भी...बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

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  9. बहुत ही सार्थक रचना---रचना जी। आज के सन्दर्भ में जब व्यक्ति रिश्तों को भी बन कर नहीं रख पा रह।

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  10. बहुत सुंदर और भावात्मक.रिश्तों में गांठ पड़ जाए तो जुड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है.

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  11. हमें आने में विलम्ब तो नहीं हुई न

    आप अति सुंदर लिखती हैं कहने में विलम्ब नहीं करना मुझे

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  12. बात सही है! मगर भूकंप पीड़ितों को भी अपना सर्वस्व गवाने के बाद ही याद आते है यह आपसी संबंध और अपने पराये रिश्तों का महत्व अन्यथा आजकल तो किसी को यह भी पता नहीं होता की बाजू वाले घर में कौन रह रहा है। नहीं ?

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