रविवार, 5 जुलाई 2015

इत्मिनान है की वो खुश हैं

इत्मिनान है की वो खुश हैं

 

चलती हूँ जब भी, 
उतरती चढ़ती हूँ सीढ़ियाँ, 
आती हैं अजब सी आवाज़े,
घुटनों में हड्डियों से,   
कभी कड़ाती, खड़खड़ाती,
कभी कंपकपाती.
गुस्से में लाल पीला होते तो सुना था,
यहाँ तो नीली हो जाती हैं नसें.
दबोचती हैं हड्डियां उन्हें जब. 
कभी खींचती हैं मांस,
कभी बनाती हैं मांस का लोथड़ा. 
दर्द से सराबोर 
न कोई हंसी,
ना खिलखिलाहट,
ना लोच.
कुछ भी तो नहीं रहा अब यहाँ.
मनाती हूँ नसों को, 
दिखाती हूँ लेप का डर. 
नहीं मानती वो.
कभी छुप जाती हैं,
हड्डियों के नीचे, कभी मांस के नीचे. 
होती है सारी रात लुका छिपी, 
इनकी मेरी नींद से.
खुश होती हैं वो कहती हैं.
कभी तुम थे, हम नाहीं,
अब हम हैं तुम नाहीं.

12 टिप्‍पणियां:

  1. ये दर्द दरअसल नसों का तो कभी हड्डियों का सहारा ले कर अपना प्रभुत्व जमाता है ...
    सच की कविता है ये ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (06-07-2015) को "दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए" (चर्चा अंक- 2028) (चर्चा अंक- 2028) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. शास्त्री जी मेरी कृति को शामिल करने के लिए आभार

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  4. मेरे ही दर्द को शब्द दे दिये। अपनी तो यही कहानी है।

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  5. एक अनूठा विषय जिससे सब का सामना कभी न कभी होता ही है. और शायद यह ही दर्द का सत्य है ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक अनूठा विषय जिससे सब का सामना कभी न कभी होता ही है. और शायद यह ही दर्द का सत्य है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. भोगा हुआ यथार्थ शायद इसी को कहते हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी कवितायें सहजता से गंभीर बातें कहती हैं.

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