शनिवार, 23 मई 2015

ख्वाब और ख़ामोशी

ख्वाब और ख़ामोशी 

उजाले रोशनी से मिल,
धूप में घुल मिल जो गये.
बेहद नाजुक कुछ ख्वाब हमारे,
होश के आगोश में बेहोश हो गये. 
भूख की फसल उगी ही थी अभी,
वो आ के जुबाँ पे चरस बो गये.
मौत भी इस कदर मिली हमसे,
कांपते  कांपते खंजर भी रो गये.
आवाज़  निकली भी तो ऐसे,
ज्यों चीख के पाँव खो गये.
धड़कने थम गई जब हमारी, 
हम साँसों के सहारे हो गये.
अंधियारे ओढ़ सियाही की चादर, 
अमावस के चाँद हो गये.
सन्नाटे की सतह पर तब,
गुमनाम ख़ामोशी के लब  खो गये.

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भावपूर्ण रचना...

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  2. आदरणीय रचनाजी, आपका ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया और मैनें join कर लिया अगर आप भी मेरा ब्लॉग www.wikismarter.com join करें तो मुझे अति प्रसन्नता होगी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय रचनाजी, आपका ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया और मैनें join कर लिया अगर आप भी मेरा ब्लॉग www.wikismarter.com join करें तो मुझे अति प्रसन्नता होगी।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-05-2015) को "जरूरी कितना जरूरी और कितनी मजबूरी" {चर्चा - 1986} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. बहुत ही सुन्दर विचार और शसक्त अभिव्यक्ति, अतीव सुन्दर

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  6. प्रभावशाली प्रस्तुति

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  7. बहुत बहुत बहुत खूब आदरणीया

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  8. क्या बात है। बहुत ही सुन्दर रचना।

    http://chlachitra.blogspot.in
    http://cricketluverr.blogspot.in

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  9. गरीबी, भुखमरी और नशे की आदत ... जिंदगी बर्बाद होते देर कहाँ लगती है ...
    इमदा संवेदनशील रचना ...

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