रविवार, 12 मई 2013

पहेली

पहेली 

आजकल मेरे शहर में
जब तब होता है
बादलों का जमावड़ा
बादल की बाँहों में होती है
लुका छिपी वर्षा की
खुश होती हूँ
जानती हूँ दोनों के संगम से
जल्दी ही पनपेंगी
कुछ नन्हीं बूंदें
वर्षा की कोख में
होगी कुछ हलचल
फिर कौंध उठेगी बिजली
उठते ही प्रसव पीड़ा के
जन्म लेंगी नन्ही नन्ही बूंदे
बज उठेंगी थालियाँ
उतरेंगी नन्ही परियां धरती पर
पर कुछ भी नहीं हुआ ऐसा वहां
उठीं अनगिनत उंगलियां
सबने एक ही स्वर में कहा
बाँझ हो गई वर्षा
सोच नहीं पाती हूँ मैं
नहीं है कोई जवाब मेरे पास
वर्षा बाँझ हो गई
या बादल नपुंसक.

25 टिप्‍पणियां:

  1. जब नन्ही बूँदों ने जन्म ही नहीं लिया....तो आपकी सोच वाजिब है...सारा दोष वर्षा को ही क्यों?

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  2. वर्षा बाँझ हो गई या बादल नपुंसक

    प्रश्न समसामयिक

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  3. गहरे भाव ... कसूर वर्षा पे ही डाला जाता है ... पुरुष प्रधान जो समाज है ...
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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  4. सचमुच अजीब पहेली है... .मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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  5. दोष न वर्षा का है , न बादलों का,
    मनुष्य ने धरा को ही दूषित कर दिया है।

    सुन्दर रचना।

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  6. सही मे कोई जवाब नही है …………गहन अभिव्यक्ति

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  7. सिर्फ गरेहबान में झांकना काफी है!!!!

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  8. वाह! कहाँ तक पहुँच गयी आपकी सोच! बहुत गहन अभिव्यक्ति!
    ~सादर!!!

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  9. अपनी सुविधा के लिए हम प्रकृति से खेल रहे हैं सो प्रकृति भी अब प्रतुत्तर देने लगा है. सुन्दर रचना.

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  10. आज कल तो कम से कम बादल टैस्ट करा लेते हैं नहीं तो वर्षा ही बांझ करार दे दी जाती थी .... गहन अभिव्यक्ति

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  11. बहुत सुन्दर ..गहन अभिव्यक्ति

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  12. बहुत सुंदर रचना... बादल और वर्षा को आपने बेजोड़ चित्रित किया.. बहुत बधाई.

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  13. बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ....

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  14. कोमल भाव लिए बहुत ही संवेदनशील
    रचना और विचारणीय भी...
    गजब...

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  15. सोचने को मजबूर करती रचना..

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  16. पुरुष-प्रधान समाज में नारी का दर्द ....कितनी सहजता से आपने इसको शब्द दे दिए .....बहुत ही सुंदर

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  17. कोख में पलेंगी कुछ बूंदें
    वाह बहुत सुंदर कल्पना
    सुंदर रचना
    बधाई

    आग्रह है पढ़ें "अम्मा"
    http://jyoti-khare.blogspot.in

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  18. वर्षा बाँझ या बादल नपुंसक !
    अनोखे अनूठे नवीन बिम्ब !

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  19. यहाँ भी स्त्रीवाची पर ही उँगलियाँ उठी !!!

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