रविवार, 28 अप्रैल 2013

महाभारत

महाभारत 
 

आज के इस युग में
जब देखो जहाँ देखो
दिखाई सुनाई पड़ती
महाभारत
पिता-पुत्र द्वन्द
मेरा घर भी
नहीं है अछूता
न चाहते हुए भी
सारा दिन हर पल
होता है यहाँ भी
पिता पुत्र द्वन्द
और कोई नहीं...
ये हैं अर्जुन अभिमन्यु
अर्जुन सदैव तत्पर
त्वरित धीर गंभीर
ऑंखें स्थिर
अपने लक्ष्य पर
माँ की कोख से
सीख कर आया
अभिमन्यु
कभी शांत
कभी सौम्य
कभी उत्पाती
चक्रव्यूह में
फंसता, निकलता
हारता, बैठता
पर हार कर भी जीतता.
अर्जुन मस्तिष्क है मेरा
जो जीत कर भी हारा.
अभिमन्यु दिल है मेरा
जो हार कर भी जीता.
जब भी मरा है कोई
अश्वत्थामा की मौत
तो बस मेरा मन.

28 टिप्‍पणियां:

  1. हर दिन दर्पण में महाभारत का कोई न कोई पात्र दिख जाता है।

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  2. जब भी मरा है कोई
    अश्वत्थामा की मौत
    तो बस मेरा मन.
    सच्ची अभिव्यक्ति खूबसूरती से
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमेशा की तरह आपकी कविता में इस बार कुछ नए प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात रखनेकी कोशिश दिखाई दे रही है.. वर्त्तमान सन्दर्भ में बड़ा उचित प्रश्न उठाया है आपने, किन्तु निर्णयात्मक होना उचित नहीं.. पिता पुत्र के इस द्वंद्व में भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में पिता और पुत्र दोनों ही सही या गलत हो सकते हैं.. आवश्यकता है एक सामंजस्य बनाए रखने की.. और शायद हर द्वंद्व में यह आवश्यक है.. और हाँ, अश्वत्थामा की मृत्यु.....???????

    कविता बहुत सुन्दर है!!

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  4. दिल और दिमाग का महाभारत हमेशा चलता रहता है।
    बढ़िया रचना।

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  5. बहुत सार्थक रचना .हाँ !महाभारत घर घर में ही होता है द्वंद्व भी सम्बन्धों का यहीं है रावण भी हमारे अन्दर है विकारों का बाहर उसका पुतला जलाने से राम सिंह नहीं मरेगा .

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  6. दिल ओर दिमाग का द्वंद तो जीवन भर चलता रहता है ...
    न खत्म होने वाली जंग है जिसका धागा दिमाग के पास रहता है ...

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  7. नमस्कार
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (29-04-2013) के चर्चा मंच अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ

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  8. सच....
    एक युद्ध सा चलता रहता है भीतर..
    बहुत बढ़िया रचना...

    सादर
    अनु

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  9. क्या खूब भावों को उतारा है ………सटीक

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  10. अच्छा लगा अर्जुन और अभिमन्यु की लड़ाई .उपमाएं बहुत सुन्दर हैं.
    मैं भी आपके ब्लोग्स का अनुशरण कर रहा हूँ

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  11. बहुत सुंदर कल्पनाओं की अभिव्यक्ति रचना जी ....हर दिन एक नयी महाभारत ....स्वयं से
    आखिर कितना युध्ह करे मनुष्य ....

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  12. जीवन से जुड़ा है द्वन्द .....वास्तविक प्रहार तो मन पर ही झेलता है

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  13. जीवन एक द्वन्ध है..सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  14. बहुत सुंदर प्रस्तुति ....अभिमन्यु दिल है मेरा जो हार कर भी जीता .

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  15. गहन अनुभूति
    सुंदर रचना
    बधाई

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  16. अंतर्मन की कथा कहते महाभारत के कालजयी पात्र

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  17. बहुत खूब लिखा आपने | बहुत ही सुन्दर शब्दावली द्वारा विचारों को अभिव्यक्त किया | पढ़कर अच्छा लगा | सादर

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    उत्तर देंहटाएं
  18. घर घर में महाभारत ..... यहाँ आपने दिल और दिमाग की महाभारत लिख दी ....अश्वथामा न जाने कितनी बार मारता है लेकिन श्राप से ग्रसित मर भी नहीं पाता । गहन अभिव्यक्ति

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  19. वाह ! दिल जो हार कर भी जीतता है और मन जो मरकर भी नहीं मरता है..बहुत सटीक बिम्ब...

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  20. एक युद्ध सा चलता रहता है भीतर..बहुत बढ़िया रचना...

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