शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

बसंत

बसंत

आकाश के तन पे नीला अंगरखा
उस पर केसरिया पगड़ी
माथे पे सूरज की टिकुली लगाई है.

हवा के घोड़े पे सवार
आकाश की बारात
धरती को ब्याहने आई है.

पल्लवों की परछाई ने
धरती की हथेली पे
धूप छाँव की मेहंदी रचाई है.

पेड़ों पौधों के नीचे
सूखे पत्तों के गलीचे
टहनियों पे तरुनाई है.

चिड़ियों का चहकना
हवा का महकना
सर्दी गर्मी की छुपन छुपाई है.

फूलों का लहंगा
पत्तों की चादर
कैसी रंगत निखर आई है.

दूर क्षितिज पर मिले
वो दोनों जब
धरती अपने में
सिमटी औ सकुचाई है.

आकाश ने बढ़ कर
थामा है धरती को
मांग किरणों से सजाई है.

देखती हूँ इत उत
बढती है खुमारी
यूँ लगता है वसंत ऋतु आई है.

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत-बहुत सुन्दर वर्णन! पढ़कर मन प्रसन्न हो गया ! :-)
    'आपको सपरिवार बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ !' :-)
    ~सादर!!!

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  2. वाह ... बेहतरीन
    बसंत पंचमी की अनंत शुभकामनाएँ

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  3. बहुत सुंदर और विस्तृत वर्णन बसंत का ... खूबसूरत रचना

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  4. वाह ...
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति |
    आभार आदरेया |
    सादर नमन

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  6. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

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  7. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!बेहतरीन अभिव्यक्ति.सादर नमन ।।

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  8. बसंत का सुन्दर वर्णन।
    बसंत आते ही गाँव की याद आती है।

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  9. बहुत बहुत सुन्दर रचना के लिए बधाई

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  10. बहुत सुंदर मनोहारी वर्णन बसंत का ....
    चित्रकारी शब्दों की ....
    बहुत बधाई एवं शुभकामनायें रचना जी ...

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  11. बसंत आगमन का उत्कृष्ट चित्रण ......

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  12. इस खूबसूरत बासंती कविता के लिए हार्दिक बधाई ....

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  13. पढ़ कर लगा कि वसंतोत्सव मना रहे हों ..
    बधाई !

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