शनिवार, 26 जनवरी 2013

राष्ट्रवादी


राष्ट्रवादी 
भ्रष्टाचार की कोख में
सांसों की डोर थामे
एक नया जीवन
कभी अनिच्छा,
कभी मात्र एक इच्छा
कई बार संस्कारो की उबकाई
कहीं सत्ता की अनिद्रा
कहीं सत्ता में ही निद्रा
कभी धन का अपच,
कहीं लालच की मितली
कही अनकही सुगबुगाहट
भाग्य की करवट
भ्रष्टाचार के लहू से
सिंचित नव जीवन
जन्म होता है
राष्ट्रवादी विध्वंस
राष्ट्रवादी भ्रष्टाचार
राष्ट्रवादी हिंसा का
जानती हूँ मैं
पर शायद अनभिज्ञ है वो
सत्य से
कि अभिशप्त है वो कोख
एक राष्ट्रवादी न जनने को।

32 टिप्‍पणियां:

  1. शुभप्रभात :))
    पर शायद अनभिज्ञ है वो
    सत्य से
    कि अभिशप्त है वो कोख
    एक राष्ट्रवादी न जनने को।
    सामयिक सार्थक रचना !!
    सादर !!

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  2. आज कल के हालात को बयाँ करती बहुत ही सार्थक रचना।

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  3. प्रभावी प्रस्तुति ||
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें-

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  4. समय को बयां करती रचना । पर उम्मीद पे दुनिया कायम है, कहीं न कहीं इस अंधेरे की कोख से फूटेगी उजाले की किरन । गणतंत्र दिवस मंगलमय हो ।

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  5. कैसे भी देश में हालात हो जाएँ,
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ।

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  6. behad sundar rachnaa... aaj kee stithi aur mere man ke shabd ...jinhen aapne piro diya ...adbhut ...Sadar

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  7. वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य को रेखांकित करती सार्थक रचना -गणतंत्र दिवस की शुभ- कामनाये

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  8. कि अभिशप्त है वो कोख
    एक राष्ट्रवादी न जनने को।

    सामयिक और सार्थक रचना,,,,

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,
    recent post: गुलामी का असर,,,

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  9. रचना अच्छी है मगर कोख कभी अभिशप्त नहीं होती.काश आप कोख किजगाह कुछ और लिख देतीं

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  10. मन की टीस......
    शुभकामनायें!

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  11. बहुत प्रभावपूर्ण..रचना..गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,

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  12. क्षुब्ध मन की अभिव्यक्ति...क्षुब्ध होना स्वभाविक है गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

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  13. जनता है राष्ट्रवादी तभी तो हम जिंदा और आज़ाद हैं

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  14. गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें...... सहमत हूँ....सुंदर पंक्तियाँ

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  15. राष्ट्रवाद के बाद कहीं राष्ट्रवादी कविता का भी 'कॉपीराईट' रिजर्व न हो जाए।
    (gandhivichar.blogspot.com)

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  16. सशक्त व प्रभावशाली रचना ,,,,
    सादर !

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  17. जब हर काम में भ्रष्टाचार होगा तो कोई कैसे बच पाएगा ... अभिशाप भी फलित होगा ... विचारणीय रचना

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  18. बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति ...

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  19. पर शायद अनभिज्ञ है वो
    सत्य से
    कि अभिशप्त है वो कोख
    एक राष्ट्रवादी न जनने को।

    ....आशा फिर भी यही है कि कभी तो जन्मेगा कोई राष्ट्रवादी उस कोख से...बहुत सुन्दर और सार्थक रचना..

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  20. देश के मौजूदा हालात ऐसे ही हैं..पर सच्चे राष्ट्रवादी क्या अब भी नहीं हैं..हम और आप..जैसे हजारों..

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  21. बहुत प्रभावशाली रचना! पढ़ते-पढ़ते ही राष्ट्र की होती हुई दुर्दशा से बदबू आने लगी.....
    ~सादर!!!

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  22. सच को बयां करती सार्थक रचना..

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  23. राष्ट्रवादी विध्वंस राष्ट्रवादी भ्रष्टाचार राष्ट्रवादी हिंसा का जानती हूँ मैं
    ...सच कहा आपने, रचना दी

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  24. मन को झकझोरती है ये रचना ... सामयिक रचना ...

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