रविवार, 13 जनवरी 2013

ख्वाब

ख्वाब

झलती रही पंखा साँझ सारी शाम,
रात बोझिल हुई चुप चाप सो गई.

मुंह ढांप के कुहासे की चादर से,
हवा गुमनाम जाने किसकी हो गई.

चाँद ने ली करवट, बांहों में थी चांदनी,
रूठी, छूटी, छिटकी, ठिठकी वो गई.

बदली के आंचल की उलझने की हठ,
आकाश की कलँगी भिगो गई.

बादल के बाहुपाश में आ कर दामिनी,
मन के सारे गिले शिकवे भी धो गई.

राग ने रागिनी को धीमे से जो छुआ,
वो बही, बह के कानों में खो गई.

आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.

सज संवर के पंखुरियों पे बैठी थीं जो,
आज वो ओस की बूंदें भी रो गईं.

मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई. 

32 टिप्‍पणियां:

  1. शुभप्रभात :))
    मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
    पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई.
    सबके एक से हालात .... !!
    आप को लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएँ.... :))

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  2. चाहो न चाहो - ज़िन्दगी गुजर ही जाती है

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  3. बहुत बढ़िया .
    सुन्दर तस्वीर से मेल खाती सुन्दर रचना।

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  4. मन का गहरा बोझ उठाये,
    जीते रहते प्रतिदिन थोड़ा।

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  5. आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
    सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.

    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ .... सुंदर प्रस्तुति

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  6. बहुत प्यारी रचना...
    मकर संक्रांति की ढेर सारी शुभकामनाएं..

    अनु

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  7. राग ने रागिनी को धीमे से जो छुआ,
    वो बही, बह के कानों में खो गई...

    बहुत खूब ... मधुर रचना ... हर छंद मन में उतर जाता है ... भावमय रचना ... लोहड़ी की बधाई ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी कविताओं से अलग... मगर एक बात कॉमन है.. यह कविता भी एक पेंटिंग की तरह लग रही है!! बहुत सुन्दर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी कविताओं से अलग... मगर एक बात कॉमन है.. यह कविता भी एक पेंटिंग की तरह लग रही है!! बहुत सुन्दर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
    पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई.

    ...गठरी कितनी भी हो भारी, आखिर उसको ढोना ही पड़ता है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  11. सुन्दर प्रस्तुति |
    शुभकामनायें ||

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  12. बहुत सुंदर !
    आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे
    सुबह नमक की खेती के बीज बो गयी...~ख्वाबों का अंजाम अक्सर यही होता है...
    मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
    पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई...~शायद... यही है ज़िंदगी...
    ~सादर!!!

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  13. आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
    सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.

    यही है एक हकीकत ज़िन्दगी की …………बहुत सुन्दर

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  14. मन की गठरी है आज भी बहुत भारी,
    पर हाय मेरी किस्मत उसको भी ढो गई.

    शायद यही मेरी किस्मत है,या जिन्दगी हकीकत,,
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,,,बधाई रचना जी,,,,

    recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

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  15. अति सुंदर ........ मन के भावों की गहरी अभिव्यक्ति

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  16. मन की उदास परतों को उधेड़ती है यह रचना नया रूपकात्मक भेष भरे .बढिया बिम्ब ,सशक्त अभिव्यक्ति अर्थ और विचार की .संक्रांति की मुबारकबाद .आपकी सद्य टिप्पणियों के लिए

    आभार .

    मुबारक मकर संक्रांति पर्व .

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  17. वाह ... बहुत ही उम्‍दा प्रस्‍तुति

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  18. वाह ! लाजवाब लिखा है रचना जी आपने..

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  19. सुबह नमक की खेती के बीज बो गयी,क्या बात है बहुत ही सुन्दर।

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  20. आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
    सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.

    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ . सुंदर प्रस्तुति
    वाह .बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  21. वाह बहुत खूब ...मन की घुटन को शब्द मिल गए

    उत्तर देंहटाएं
  22. बड़ी प्यारी खुशनुमा सी कविता है,
    मूड खुशगवार कर गयी .

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  23. सुन्दर सुकोमल रचना... है आपकी

    राग ने रागिनी को धीमे से जो छुआ,
    वो बही, बह के कानों में खो गई.

    वाह!
    क्या खूब कहा है

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  24. आँखों में ख्वाब के अंकुर ही थे फूटे,
    सुबह नमक की खेती के बीज बो गई.
    man ki udasi ko behad khoobsurati se ukera hai aapne..

    उत्तर देंहटाएं

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