रविवार, 16 दिसंबर 2012

भविष्य


भविष्य 
हर दिन  सुबह सवेरे
बनाती हूँ जब चाय
देखती हूँ गर्म पानी के इशारे पे नाचती
चाय की पत्ती
उसका दिल जीतने का
हर संभव प्रयास करती
इतराती, इठलाती, बलखाती,
झूम झूम जाती
तब तक
जब तक बंद नहीं कर देती मैं आंच
जब तक खो नहीं जाता
उसका रूप, रंग, यौवन
सुडौल सुन्दर दानों की जगह
बेडौल थुल थुल काया
फिर बैठ जाता है
पत्तियों का झुण्ड
बर्तन की तली पर
थका, हारा, हताश,
फिर भी शांत.
दूर कर देती हूँ फिर मैं
पत्ती को उसी के पानी से.
सोचती हूँ कहीं
स्त्रीलिंग होने मात्र से
उसका भाग्य स्त्रियों से
जुड़ तो नहीं जाता
नहीं चाहती हूँ उसे
उसी की किस्मत पे छोड़ना
कूड़े के ढेर पर पड़े पड़े खत्म होना
उठाती हूँ बड़े जतन से उसे
ले जाती हूँ अपने सबसे प्यारे
और दुर्बल पौधे के पास
मिलाती हूँ उसकी
सख्त मिटटी में इसे
खिल उठती है वो मिटटी
भुर भुरी हो उठती है
आश्वस्त हूँ अब
जी उठेगा मेरा पौधा
जाते जाते कोई
जीवन दान जो दे गया है उसे.

36 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 15/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सोचती हूँ कहीं
    स्त्रीलिंग होने मात्र से
    उसका भाग्य स्त्रियों से
    जुड़ तो नहीं जाता नहीं चाहती हूँ उसे
    उसी की किस्मत पे छोड़ना
    कूड़े के ढेर पर पड़े पड़े खत्म होना

    कोमल मन की अभिव्यक्ति ,बेमिसाल !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut sundar ... aiksanvedansheel man hee itna bhavuk ho sakta hai chaay patti ke liye bhi.. aapka man jaan liya.. umda

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुबह की चाय और आपका काव्य सर्जन - वाह - लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुबह की चाय और आपका काव्य सर्जन - वाह - लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  6. कोमल भाव की अति सुन्दर रचना..
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  7. मिटने के बाद भी काम आती है ... जी उठती है फिर से नए रूप में ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह!! कमाल की रचना...जाते जाते भी कोई जीवन सन्देश दे जाए इससे बढ़कर क्या हो सकता है|

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत गहन बात .... चाय की पट्टियाँ जाते जाते भी पौधे को जीवन दान दे गईं ...उसू तरह स्त्री भी जाते जाते न जाने दूसरों के लिए कितने काम कर जाती है .... सुंदर प्रस्तुति ...

    उत्तर देंहटाएं
  10. मरते-मरते बलिदान दे गयी
    किसी को जीवन-दान दे गयी ....
    गहरे अहसास !

    उत्तर देंहटाएं
  11. मेहंदी की तरह चाय की पत्ती भी अपना रंग उस पानी को देकर स्वयं बैठ जाती है.. ताकि कोई उसे वहाँ से हटा दे... नारी ही क्यों, साधू प्रकृति इंसान, अपने सारे गुण इस जगत को देकर उसी मिट्टी में मिल जाते हैं जहाँ से वो आये थे. और दधीची की तरह वज्र बनाकर संहार का कारण बनते हैं... और नारी तो धरा की तरह सब धारण करती है!!
    अनूठे अन्दाज़ में कही आपकी बात, प्रभावशाली है!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. ..किसी का मन जितने के लिए ये कैसी तड़प!..बहुत सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुबह की चाय पर सुन्दर अभिव्यक्ति..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. जीवन-दान मर कर भी.. बेहतरीन अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  15. कविता के माध्यम से सार्थक सन्देश देती सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  16. चाय की पट्टी का खुबसूरत मानवीयकरण संवेदनाओं सहित

    उत्तर देंहटाएं
  17. जी उठेगा मेरा पौधा
    जाते जाते कोई
    जीवन दान जो दे गया है उसे.,,

    वाह बहुत खूब सार्थक उम्दा प्रस्तुति ,,,, बधाई।

    recent post हमको रखवालो ने लूटा

    उत्तर देंहटाएं
  18. औरत और चाय की पत्ती .नशा दोनों में है और चक्रित होतीं है दोनों कायनात को चलाए भी रखतीं हैं .उत्पादक है .

    उत्तर देंहटाएं
  19. औरत और चाय की पत्ती .नशा दोनों में है और चक्रित होतीं है दोनों कायनात को चलाए भी रखतीं हैं .उत्पादक है .अपने ही बिम्बों और तदानुभूत सत्यों को हर कोई अंजता है चलो चक्रण में आई ,खाद बनी चाय की पत्ती उर्वरक बनी स्त्री सी .

    उत्तर देंहटाएं
  20. औरत और चाय की पत्ती .नशा दोनों में है और चक्रित होतीं है दोनों कायनात को चलाए भी रखतीं हैं .उत्पादक है .अपने ही बिम्बों और तदानुभूत सत्यों को हर कोई आंजता है चलो चक्रण में आई ,खाद बनी चाय की पत्ती उर्वरक बनी स्त्री सी .

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत ही बढ़िया रचना।
    चाय की पत्ती की ये कहानी भी खूब है,अच्छा किया जो उसे कूड़े के ढेर से उठा लिया आपने ..

    उत्तर देंहटाएं
  22. वही जीवन सार्थक है जो खत्म होते-होते भी किसी को कुछ दे जाए...
    बेहद खूबसूरत रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  23. कोमल मन की अभिव्यक्ति ,बेमिसाल !सुन्दर प्रस्तुति.मंगल कामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  24. बहुत सुंदर ! :-)
    आपकी लेखनी ने एक छोटे से काम को कितना बड़ा कर दिया !:)
    ~सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  25. दूर कर देती हूँ फिर मैं पत्ती को उसी के पानी से. सोचती हूँ कहीं स्त्रीलिंग होने मात्र से उसका भाग्य स्त्रियों से जुड़ तो नहीं जाता

    ...बहुत सुन्दर विम्ब..गहन अहसासों की बहुत सुन्दर और भावमयी अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  26. चाय की पती के साथ साथ बहुत से विचार भी उबल रहें है ...सादर

    उत्तर देंहटाएं
  27. वाह रचनाजी .....बहुत ही सुन्दर रचना ....वाकई .....:)

    उत्तर देंहटाएं
  28. सूक्ष्म अध्ययन. सुन्दर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  29. अब हर दिन चाय बनाने का एक अलग नज़रिया होगा...सुंदर रचना।।।

    उत्तर देंहटाएं
  30. स्त्रियों से जुडे इस भाग्य से ही तो किसी और का जीवन संवारने का सौभाग्य उसे मिलता है । हमारे यहां तो गुलाब के पौधे लहलहाते हैं इसके संयोग से ।

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...