रविवार, 14 अक्तूबर 2012

आत्महत्या


आत्महत्या 
व्यथित होती हूँ
जब पढ़ती हूँ
समाज में व्याप्त व्यभिचार
तनाव, बेचैनी, हताशा.
भाग दौड में जीवन हारते लोग
हर रोज कितनी ही आत्महत्याएं 
पुलिस, तहकीकात, शोक सभाएं.
मेरे घर में भी हुईं
कल कुछ आत्महत्याएं.
हैरान हूँ, शोकाकुल हूँ.
असमंजस में हूँ
बन जाती हूँ.
कभी पुलिस,
कभी फोरेंसिक एक्सपर्ट,
कभी फोटोग्राफर. 
देखती हूँ हर कोने से
उठाती हूँ खून के नमूने
सहेजती हूँ बिखरे अवशेषों को.
नहीं जानती कोई कारण इसका.
मेरी बेरुखी...अनदेखी...
या व्यस्तता.
पर हां ये सच है
मेरे दिल में रची बसी
मेरी करीबी कुछ किताबों ने
मेरी ही अलमारी की
तीसरी मंजिल से कूद कर
आत्म हत्या कर ली.

31 टिप्‍पणियां:

  1. कम से कम पुस्तकों में यह हताशा न पनपे।

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  2. जी रचना जी,बुक सेल्फ पर दम तोड़ती किताबें ऐसा ही अहसास देती हैं। खूबसूरत रचना।

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  3. बदलते परिवेश में कभी कभी किताबें भी बूढी लगने लगती हैं .

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  4. ये आत्महत्याएं सुर्ख़ियों में नहीं आतीं,पर मन - वह खुद को तौलने ही लगता है

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  5. किताबें भी हताश हो गयी हैं ..... लोगों की पढ़ने की प्रवृति कम होती जा रही है ...

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  6. हाँ कुछ ऐसा ही लगता है, जब इसा भागदौड़ भरी जिन्दगी में कभी प्रिय रही को उठा कर धुल झाड़ने का भी वक्त नहीं है इसके लिए हम पुलिस बने जज न्याय शायद ही कर पायें क्योंकि समय के साथ बढ़ रहे और साधनों ने हमारे वक्त को गिरवी जो रख लिया है।

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  7. चटकारे ले चाटते, चिट रख कर दस बार |
    किन्तु समय अब काटते, नहीं रहा अब प्यार |
    नहीं रहा अब प्यार, सुबह श्वेतांगी आती |
    बदलो हर सप्ताह, शक्ल रंगीनी भाती |
    यह खट-खट यह मूस, नजर पर छाय तुम्हारे |
    मरुँ आज मैं कूद, पढों लेकर चटकारे ||

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  8. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  9. किताबों ने आत्महत्या की...क्या करे बिचारी, उपेक्षित महसूस करती होगी|
    गहन भाव!!!

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  10. उपेक्षा तो कोई भी बर्दाश्त नही कर पाता फिर जड हो या चेतन

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  11. नाकाम कोशिश की होगी रचना जी.....
    देखिये उठा कर...पन्ने पलटिए...साँस बाकी ज़रूर होगी....
    आपके हाथ आकर फिर से धड़कने लगेंगी,,

    अनु

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  12. परिवेश कितना भी बदले,किताबें हमारे देश की धरोहर है,बूढी भले हो जाय लेकिन हमारे इतिहास संजोये रखेगी,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

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  13. मामले की जांच करने के लिए मौका ए वारदात पर आना होगा :)

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  14. वाह रचना जी, रचना हो तो ऐसी ... किताबो से बढती उपेक्षा को दर्शाती इससे बेहतर कविता और क्या होगी ...

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  15. समाज में पसरती वैचारिक निःशक्तता कविता में स्पष्ट मुखर हुई है।

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  16. हर अगली पंक्ति धड़कन बढ़ाती हुई अपने मंतव्य तक ले जाती है. बहुत बढ़िया..

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  17. वाह रचनाजी ...जवाब नहीं ...नि:शब्द कर दिया आपने !

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  18. अपनी व्यथा को ...आपने रचना भा डाला ???
    धीरज धरें!

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  19. बढ़िया प्रस्तुति . किताबों का प्रतीक बहुत अच्छा उठाया है तीसरी मंजिल से कूदने वाली किताबें ....वाह .कृपया बे -चैनी कर लें ,"बे" माने बिना बोले तो विद आउट ,"बा" मीन्स विद बोले तो सहित ,जैसे बा -खबर होना ,बे -खबर रहना .बे और बा उर्दू के उपसर्ग हैं .

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  20. JAB kitabon se hi aisi berukhi hai to samjha ja sakta hai manav-man ka kya haal hoga. is shoony virakti se sheeghr hi bahar nikalne ka prays kijiye varna dino-din ye paristhity bhayanak ho jayegi.

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  21. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

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  22. वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  23. जब प्यार से छूने वाले हाथ उन किताबों को भूल जाते हैं तो उनकी हताशा जायज़ है...एक नया अहसास जगाती ख़ूबसूरत रचना...

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  24. समय के आभाव ने किताबों को भी नहीं बख्शा --
    बेहतरीन प्रस्तुति

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  25. समय के आभाव ने किताबों को भी नहीं बख्शा --
    बेहतरीन प्रस्तुति

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  26. kabhi kabhi apni pasand gayab si ho jarti hai... unhen naa chhuna hi pustko ki aatmhtya hai..

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