रविवार, 6 मई 2012

मसीहा

किसी की मनःस्थिति,
सुकोमल भावनाएं,
मर्यादा, सीमा,
लक्ष्मण रेखा लांघना.
न सोचते हैं, न देखते हैं
ये शील हरने वाले
जानते और सोचते हैं तो बस
सीमा रेखा लांघना,
कुचलना, रौंदना और दर्द देना.
कल ही की तो बात है
जमाने के बाद
कई लेप लगाए थे
भरपूर श्रृंगार किया था.
मेरे घर से हो कर गुजरने वाली सड़क ने
नज़र न लग जाये किसी की.
सो आनन फानन में
ओढ़ ली डामर की काली चमकीली ओढ़नी
फिर क्या था ...
बिना रुके, अटके, बडबडाये,
शरू हो गयी वाहनों की दौड़ और होड़.
उस पल वो
सकुचाई, शर्माई, इतराई, लजाई
अपनी किस्मत पर
अगले ही दिन ....
डाल दिया जल निगम वालों ने अपना डेरा
तार तार कर दी
नई काली चमकदार डामर की ओढ़नी
छिन्न भिन्न कर डाले अंग
टुकड़ा टुकड़ा देह और बस एक टीला भर
धूल माटी में चेहरा छुपाए
सबकी नज़र बचाए
दुबक गयी बेचारी सडक
क्या हमारी ही तरह वो भी
प्रतीक्षा कर रही है
किसी मसीहे का.
कभी तो होगा कोई
जो बचा लेगा
उसकी ओढ़नी तार तार होने से.

32 टिप्‍पणियां:

  1. नित यही नजारे देखने को मिलते हैं, अपने काम के लिये सड़कें खोद दी जाती हैं।

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  2. सब कुछ कह दिया ....अपनी तरह से ...निश्चित रूप से कविता बहुत प्रासंगिक है .....!

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  3. यह स्वरुप भी कविता में ....
    बहुत खूब ...
    शुभकामनायें आपको !

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  4. नगर निगम नगर को न ग़म है न शर्म ।
    शायद उनको बज़ट तोड़ने के लिए ही मिलता है ।

    कविता में सुन्दरता से सही बात कही है ।

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  5. अद्भुत दृष्टि.. पैनी नज़र और कमाल की संवेदनशीलता... आज श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' याद आ गई जहां एक ट्रक की चाल का वर्णन याद आ गया जिसके विषय में उन्होंने कहा है कि इसका जन्म सड़क का बलात्कार करने के लिए ही हुआ है.. आपने दो-चार और ऐसे बलात्कारियों (जल-बोर्ड, टेलीफोन आदि) से दो चार करवाया.. ज़बरदस्त!!

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  6. कल 07/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. सच में सड़क बनी नहीं की उसे तोड़ने वाले तैयार बैठे रहते है. सटीक अभिव्यक्ति .

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  8. समाज के कुछ भेदिये नज़र गडाए रखते हैं की कब वो नयी हो और उसको उघाड़े सब के सामने वो ...
    सामयिक रचना ... अच्छे प्रतीक ...

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  9. सुन्दर प्रस्तुति, सटीक अभिव्यक्ति /

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  10. सड़क के माध्यम से आपने कविता के कथ्य का बखूबी निर्वाह किया है।

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  11. क्या हमारी ही तरह
    वो भी प्रतीक्षा कर रही है
    किसी मसीहे का.
    कभी तो होगा कोई
    जो बचा लेगा
    उसकी ओढ़नी तार तार होने से.

    वाह ॥बहुत सुंदर ....गहन अवलोकन ... अक्सर यही होता है सड़क बन कर तैयार होती है और दूसरे दिन खोद दिया जाता है ... तुलनात्मक विवेचन सटीक लिखा है ... सुंदर प्रस्तुति

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  12. in sab ki pakad k dhunayi kar deni chaahiye dekhiye to jaraa se reejhte bhi nahi us nayi naweli ki sundarta par moye...

    kataaksh karti sunder rachna.

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  13. सड़क की वेदना नारी मन से जोड़ कर बखूबी बयां की है ....!!
    सुंदर रचना ....
    शुभकामनायें ...!!

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  14. वाह...............
    बेहतरीन कटाक्ष....गहन सोच वाली रचना....

    बधाई.

    सादर.

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  15. गहरी अभिव्यक्ति .... सुन्दर प्रस्तुति ।

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  16. गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  17. सही कहा है आज मसीहा ही ओढ़नी को तार-तार करते हैं..पर दर्द कौन सुने...

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  18. शीर्ष पर पहुंचने के लिए लाखों पलों की साधना चाहिए,मगर मूर्च्छा का एक पल ही काफी है जीवन को गर्त में ले जाने के लिए- अपनी हो कि किसी और की!

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  19. सार्थक रचना ...विशेष कर तुलनात्मक अभिव्यक्ति ...आदेशों और आधिपत्य की प्रबलता

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  20. ek ek shabd taraass kar likha hai aapne .kammal hai-----aakhiri ki panktiyan ya kahiye vikalp bahut hi achha laga.
    badhai
    poonam

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  21. हमारी मानसिकता पर एक सशक्त चोट...बहुत सुन्दर

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  22. यह कलियुग है घोर कलियुग यहाँ किसी मसीहे की उम्मीद रखना भी बेकार है। अब वक्त है मुंह टॉस जवाब देने का अपने हक के लिए खुद ही लड़ना होगा तअभी कुछ बात बनेगी ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  23. इधर भी खुदा है उधर भी खुदा है
    जहाँ आज बच गया, कल खुदेगा।

    सामाजिक चिंता को प्रशासनिक अव्यवस्था के प्रतीक से अच्छी प्रकार व्यक्त किया है आपने!

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  24. एक अनुपम रचना !
    विचारों कि तीक्ष्णता कविता को सार्थकता प्रदान कर रही है.

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