रविवार, 8 अप्रैल 2012

सम-विषम


सम-विषम



जब भी छा जाता है
जीवन में अन्धकार
शून्य सी हो जाती हूँ
मिटाने को अकेलापन
लगाती हूँ
हम प्याले, हम निवाले,
हम साये, हम शक्ल से
कुछ  अंक,
शून्य से पहले
और हमेशा ही घटती
और विभजित होती हूँ
सम  संख्याओं की तरह
कुछ इस  तरह की
कुछ भी बचा नहीं पाती अपने लिए
मात्र एक शून्य के
विषमताओं से सीखा है
शून्य से परे कुछ अंक लगाना
घटती और विभाजित तो होती हूँ आज भी
इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर
कुछ अंक अपनी मुट्ठी में
विषम  संख्याओं की तरह
निकलने लगी हूँ अब
सम संख्याओं के जाल से
पहचान जो लेती हूँ
अनेकों सम में छुपे कुछ विषम चेहरे
यूँ बच जाती हूँ
कई बार शून्य होने से
शून्य से अंकों तक
और अंको से शून्य तक
जी लेती हूँ एक सम्पूर्ण जीवन.  

46 टिप्‍पणियां:

  1. पहचान जो लेती हूँ
    अनेकों सम में छुपे कुछ विषम चेहरे

    वाह ॥बहुत गहन अभिव्यक्ति ..... बस हाथ में शून्य नहीं होना चाहिए ... वैसे स्वयं शून्य की स्थिति में आ जाएँ तो समझो मोक्ष मिल गया ।

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  2. शून्य से विभाजित हो सब अनन्त होना चाहते हैं।

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  3. शून्य से शून्य की यात्रा भी तो जीवन यात्रा ही है ... वही आदि है वही अंत है ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब भी छा जाता है जीवन में अन्धकार शून्य सी हो जाती हूँ मिटाने को अकेलापन लगाती हूँ

    वाह!!!!!!अति सुंदर रचना,बहुत अच्छी गहन अभिव्यक्ति की प्रस्तुति........

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....

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  5. आदरणीय रचना जी
    नमस्कार !
    शून्य से पहले और हमेशा ही घटती और विभजित होती हूँ
    बहुत ही अलग अंदाज़ में बहुत कुछ कह देती है आप की ये कविता.....बहुत ही अर्थपूर्ण रचना है...!!!!

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  6. मैं साधारण ,बात आप की गहरी ....
    अकेलापन बाँटने के लिए ...मैं तो सिर्फ अपनी यादोँ का सहारा लेता हूँ....
    शुभकामनाएँ!

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  7. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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  8. सुंदर रचना । इन विषमताओं से ही कुछ शेष चुराकर अपने लिये बच पाता है, और यही मुट्ठी में हासिल हो पाता है, वरना तो सब शून्य ही तो है। गहन चिंतनपूर्ण पंक्तियाँ ।

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  9. BAHUT SARTHAK V GAHAN BHAVON KO ABHIVYAKT KARTI AAPKI RACHNA SARAHNIY HAI .AABHAR

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  10. शून्य मे ही सम्पूर्णता है।

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  11. घटती और विभाजित तो होती हूँ आज भी
    इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर
    कुछ अंक अपनी मुट्ठी में

    गहन अभिव्यक्ति .....

    उत्तर देंहटाएं
  12. शून्य से शून्य तक - जी लेते हैं अंकित जीवन

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  13. शून्य के बिना हिसाब आगे बढ़ ही नहीं सकता...
    सम और विषम समझना ज़रूरी है.

    गहन रचना!

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  14. यूँ बच जाती हूँ
    कई बार शून्य होने से
    शून्य से अंकों तक
    और अंको से शून्य तक
    जी लेती हूँ एक सम्पूर्ण जीवन.
    Wah! Kya khoob kaha!

    उत्तर देंहटाएं
  15. ye sam visham k sawal bahut darate hain mujhe....apki rachna se bhi isliye door bhagna ka man ho raha tha...kyuki ankganit/beejganit mere bas ki baat nahi....jindgi ko bina ankganit k hi suljhane ki koshish karti hun.

    :-)

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  16. यहाँ तो गुणा भाग जोड़ घटाना कभी समझ ही नहीं आया :-(
    क्या करें ??
    शुभकामनायें आपको !

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  17. रचना जी! आपकी कविता में हर बार की तरह एक नयापन और भावों की एक नई परिभाषा है.. मगर यह शून्य है बड़ा ही अनोखा.. जिस दिन, जिस पल वास्तविक शून्य से साक्षात्कार हो गया, उस दिन न कोई अंक उसमें जोड़ा जा सकता है, न घटाया.. न आगे, न पीछे ही लगाकर उसके मूल्य में परिवर्तन किया जा सकता है!!
    बहुत सुन्दर कविता!!

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  18. what a calculated post............

    मैथ्स की तरह इसको भी समझने में वक्त लगा...

    सुंदर भाव.

    सादर.

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  19. वाह, प्रभावित करती है आपकी अभिव्यक्ति...... बहुत उम्दा

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  20. my hindi font is not doing well... sorry .. i m writing in english ..
    human life always... hangs on the suspension bridge like odd and even..
    u have beautifully... explains the doldrums we feel.. in our daily life ..//

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  22. कभी गणित में १०० % आते थे . लगता है , अब तो सब भूल गए हैं .
    वैसे शून्य में बहुत ताकत है .

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  23. शून्‍य के भाव भी सार्थक हो उठे हैं ...आपके लेखन से ..आभार ।

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  24. अच्छी प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई....

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  25. शून्य से शून्य तक की यात्रा, विषमताओं के बीच...गहन अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर

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  26. सम पर रहना बहुत ही कठिन और तकलीफदेह होता है और अपने पास शून्य ही बचता है...बहुत अच्छी प्रस्तुति ।

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  27. जीवन यह जोड़ घटाना सभी को सिखा देता है ....और रिश्तोमें तो यह आम है ...किसके हाथ क्या रह जाता है ....यह तो हमारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर है ....आपका शून्य से शून्य तक का सफ़र .....आपने बड़ी सूझ बूझ से तै किया.......

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  28. रचना जी, तो विज्ञान के बाद अब गणित की बारी है...शून्य के सिवा यहाँ कुछ भी तो नहीं है जो दिखता है वह भ्रम ही है...शून्य से प्रेम बना रहे..

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  29. शून्य में भी बहुत कुछ निहित है...बहुत सुन्दर..

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  30. इसमें ही सार्थकता है और पूर्णता भी।

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  31. बस भावनायें शून्य नहीं होनी चाहिये...सुन्दर कविता है रचना जी.

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  32. बेहतरीन भाव पुर्ण बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,लाजबाब प्रस्तुति,.... रचना जी ...

    RECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....

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  33. घटती और विभाजित तो होती हूँ आज भी
    इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर
    कुछ अंक अपनी मुट्ठी में
    विषम संख्याओं की तरह
    निकलने लगी हूँ अब
    सम संख्याओं के जाल से
    पहचान जो लेती हूँ
    अनेकों सम में छुपे कुछ विषम चेहरे
    यूँ बच जाती हूँ
    जीवन तो जी लिया ,
    अब तो रिहर्सल है ,
    थोड़ी बहुत हलचल है .

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  34. इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर
    कुछ अंक अपनी मुट्ठी में
    विषम संख्याओं की तरह
    निकलने लगी हूँ अब
    सम संख्याओं के जाल से
    पहचान जो लेती हूँ
    अनेकों सम में छुपे कुछ विषम चेहरे
    यूँ बच जाती हूँ


    मर्मस्पर्शी एवं भावपूर्ण काव्यपंक्तियों के लिए कोटिश: बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  35. ये जीवन भी तो शून्य ही हैं ....

    उत्तर देंहटाएं
  36. कुछ भी बचा नहीं पाती अपने लिए मात्र एक शून्य के विषमताओं से सीखा है शून्य से परे कुछ अंक लगाना घटती और विभाजित तो होती हूँ आज भी इसके बाद भी बचा ही लेती हूँ अक्सर कुछ अंक अपनी मुट्ठी में ..
    सुन्दर गहन और विचारणीय भाव .ऐसा भी होता है ...शून्य के आगे ..रचना जी जय श्री राधे
    भ्रमर ५

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  37. शून्य से शून्य तक ..............जिंदगी का असल पड़ाव !

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  38. अंक से शून्य तक के सफर में ही असली जीवन है।

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  39. बहुत सुन्दर.... गणित के माध्यम से जीवन का उदाहरण अच्छा लगा... :)

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