रविवार, 5 फ़रवरी 2012

पल


पल      
चंद सहमे हुए से लम्हे
कुछ भीगे हुए से पल  
इन लरज़ती बुलंदियों पर
रहने लगे हैं हम.
क्या होगा हशर अपना
ये जाने बिगैर भी अब
पाने को मुकम्मिल मुकाम
आग पर चलने लगे हैं हम.
कब बुलंदियों से आकर
यूँ खाक़ में मिले हम
इस मुश्किल सफ़र में भी
खुश रहने लगे हैं हम.
क्या बुलंदियां हो
या खाक़ हो जमीं की
पाने को चंद खुशियाँ
समझने लगे हैं हम.
सहमे हुए हों लम्हें
या भीगे हुए हों पल
वक़्त की दहलीज़ पर 
अब पलने लगे हैं हम.

48 टिप्‍पणियां:

  1. अन्तिम चार लाइनें..

    गहन जीवन दर्शन..

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  2. पल पल जीवन सरकता जाता है । हर पल महत्त्वपूर्ण है ।

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  3. गंभीर , सब कुछ वक़्त को समझने पर ही है ....

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  4. दिल की गहराइयों से निकली अच्छी कविता .आभार.

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  5. अत्यंत सुन्दर लिखा है आपने रचना जी..बहुत अच्छी लगी..

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  6. क्या होगा हशर अपना
    ये जाने बिगैर भी अब
    पाने को मुकम्मिल मुकाम
    आग पर चलने लगे हैं हम.
    ise hi apni kabiliyat manne lage hain hum

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  7. जीवन का पूरा निचोड़ है इन पंक्तियों में ... सुन्दर प्रस्तुति .

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  8. क्या बुलंदियां हो या खाक़ हो
    जमीं की पाने को
    चंद खुशियाँ समझने लगे हैं हम ..

    ये छोटी छोटी खुशियाँ ही जीवन को चलायमान रखती हैं ...

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  9. दिल की गहराइयों से निकली कविता ....
    बहुत अच्छी लगी

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  10. हर हाल में खुश रह कर जीवन जीने का संदेश देती सार्थक रचना...

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  11. Poori ki poori prvishti bahut hi shandar Rachana ji kavita ki doosara charan ki panktiyan behad prabhavshali lagi....badhai ke sath hi abhar.

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  12. सहमे हुए हों लम्हें
    या भीगे हुए हों पल
    वक़्त की दहलीज़ पर
    अब पलने लगे हैं हम.

    ....सच बीते पल भुलाये नहीं भूलते...
    सुन्दर रचना..

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  13. ्बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  14. सहमे हुए हों लम्हें
    या भीगे हुए हों पल
    वक़्त की दहलीज़ पर
    अब पलने लगे हैं हम.

    ....गहन जीवन दर्शन दर्शाती बहुत सारगर्भित रचना..

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  15. ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सार्थक रचना
    .....अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं

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  16. रचना जी, आपकी कवितायें हमेशा चकित करती हैं... इस कविता में भी एक फलसफा है छिपा है ज़िंदगी का!! बहुत अच्छी रचना!!

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  17. बहुत खूब..
    गहन भाव लिए सुन्दर कविता..

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  18. सहमे हुए हों लम्हें
    या भीगे हुए हों पल
    वक़्त की दहलीज़ पर
    अब पलने लगे हैं हम.


    वक़्त सहमें और भीगे पलों में भी जीना सिखला देता है .....
    रोकती है नज़्म......

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  19. बेहतरीन भाव पूर्ण सार्थक रचना.....
    खबरनामा की ओर से आभार

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  20. हर हाल में जी ही लेते हैं । बहुत अच्छी रचना

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  21. संघर्ष और सफलता...यही तो जीवन है।
    गहन अर्थयुक्त प्रभावी कविता।

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  22. ज़बरदस्त भावाभिव्यक्ति.

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  23. जिंदगी का सार हैं ....बहुत खूब

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  24. क्या होगा हशर अपना
    ये जाने बिगैर भी अब
    पाने को मुकम्मिल मुकाम
    आग पर चलने लगे हैं हम.
    sahi kaha sunder bhav
    rachana

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  25. खूबसूरत प्रस्तुति पर बधाई ।

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  26. न भूत न भविष्य,केवल वर्तमान महत्वपूर्ण है। जो इसमें जिएगा,वही जानेगा जीवन का राज़।

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  27. कब बुलंदियों से आकर
    यूँ खाक़ में मिले हम
    इस मुश्किल सफ़र में भी
    खुश रहने लगे हैं हम.

    sahi soch hai...vaqt to khak hone ka kabhi n kabhi aana hi hai...avashyambhaavi hai....koi rok nahi sakta....to kyu n fir bulandiyon ko chhu kar aur khush rah kar hi khaak me mila jaye.

    sunder kriti.

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  28. सहमे हुए हों लम्हें
    या भीगे हुए हों पल
    वक़्त की दहलीज़ पर
    अब पलने लगे हैं हम

    यथार्थ सेसमझौते की मजबूरी बयाँ करती रचना

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  29. वक़्त की दहलीज़ पर अब पलने लगे हैं हम.
    वाह.वाह.वाह....

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  30. हर पल, हर मुश्किल सफ़र में खुश रहना ही सिखाते हैं ये पल. स्वागत.

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  31. सार्थक चिंतन को दर्शाती रचना है.
    हर पल कीमती है.

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  32. एक शेर याद आ रहा हैं ... बुलंदियों पर पहुंचना आसान है .
    पर ठहरना मुश्किल है |
    अच्छे अशआर मुबारक हो

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  33. बहुत अच्छी प्रस्तुति रचना जी।धन्यवाद।

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  34. भाव पुर्ण बहुत सुंदर प्रस्तुति .....

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  35. इस रचना में ज़िन्दगी के कुछ खास पहलुओं को और उसके उतार चढाव को दर्शाया गया है।

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  36. सुन्दर प्रस्तुति....बेहतरीन रचना....
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

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