रविवार, 29 जनवरी 2012

और भी गम हैं ज़माने में ....

और भी गम हैं ज़माने में ....


बिना अंकों के गणित और पंचांग के 
नक्षत्रों की चाल और राशियां  
लग चुकी है ढाई महीने की ढहिया,
हो चूका है शुरू नगद नारायण उत्सव,
खिंची है बीचों बीच एक स्पष्ट रेखा,
एक ओर हैं आम जनता 
तो दूसरी ओर है एक विशिष्ट समुदाय 
बढ़ने वाला है जनता का मान, सम्मान, धन धान्य
बीमार को मिलेगी बिन मांगे दवा, तीमार को दारु 
हर तरफ बस जश्न ही जश्न.
कुछ दिन का तूफ़ान फिर सब कुछ शांत. 
न जाने फिर कब लगेगी ढहिया 
पर जनता की साढ़े-साती तय है.
आम जनता पुलिस के खोजी कुत्तों की तरह नाकाम 
सूंघती फिरेगी विशिष्ट समुदाय का पता 
वहीँ बंद कमरों में 
पिछली ढहिया में हुए नुकसान की भरपाई की जुगत 
में होगा विशिष्ट समुदाय.

39 टिप्‍पणियां:

  1. जमीनी हकीक़त ..मर्म पर आघात करती..

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  2. सही कहा है ।
    चार दिन की चांदनी , फिर अँधेरी रात ।

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  3. पिछली ढहिया में हुए नुकसान की भरपाई की जुगत
    में होगा विशिष्ट समुदाय.
    न जाने ये कब तक होता रहेगा ...... उम्दा रचना

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  4. कल 30/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. हां, हालात तो ऐसे ही हैं।

    जनता की साढ़ेसाती न जाने कब उतरेगी।

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  6. कुछ दिन का तूफ़ान फिर सब कुछ शांत.
    न जाने फिर कब लगेगी ढहिया
    पर जनता की साढ़े-साती तय है.

    सब तयशुदा है .. समसामयिक प्रविष्टि

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  7. ये तो हकीकत है अपने तंत्र की ... जनता का क्या है वो तो हमेशा से साधे साती में है ...

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  8. पर जनता की साढ़-सत्ती तय है ....
    ये ही सच है ....
    शुभकामनाएँ!

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  9. a very picturesqe... presentation of election /
    visit my blog plz

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  10. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    बसंत पचंमी की शुभकामनाएँ।

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  11. हां सही है. जनता पर तो हमेशा साढे साती ही चलती रहती है :(

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  12. सच्छाई की तस्वीर...ढैया और साढ़ेसातीः)

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  13. वाह..बहुत बढ़िया...
    इसे काश वे भी पढते जिन्होंने प्रेरणा दी है ये लिखने की...!!!!!!!!

    सादर.

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  14. रचना जी! आपके व्यंग्य की मार अचूक है मगर वे गेंडे की खाल वाले लोग हैं... ज़बरदस्त रचना है, रचना जी!!

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  15. बहुत खूब रचना जी.
    कटु सत्य.

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  16. वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

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  17. कटु सत्य की बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति,

    welcome to new post ...काव्यान्जलि....

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  18. वाकई जनता की साढ़े साती तय है...

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  19. और भी गम हैं ज़माने में ....इस राजनीति के अतिरिक्त भी

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  20. बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

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  21. ढैया हो या साढ़े साती जनता को तो पिसना ही है ! बहुत सुंदर !

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  22. कुछ भी हो , जनता की साढ़े साती तय है !
    सटीक !

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  23. बहुत सही लिखा है आपने.
    इलेक्शन के बाद ये बड़े बड़े वादा करने वाले बेईमान नेता अपनी अपनी जेबें भरने में लग जायेंगे.

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  24. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  25. कमाल की अभिव्यक्ति ....
    ऐसी चोटें कभी न कभी काम अवश्य करेंगी , नेतृत्व में बदलाव की आशा करते हैं !
    आपको शुभकामनायें !

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  26. यूं पी चुनाव पर बिलकुल सही तस्वीर, बहुत अच्छी रचना.

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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