रविवार, 11 दिसंबर 2011

मुन्तज़िर


मुन्तज़िर

(1)
आज फिर सब मेरी आँखों के सामने से गुजरा 
वही सर्द मौसम वही ज़र्द चेहरा. 
खुशियाँ पुरबहार पर हवाओं पर पहरा 
यहीं आके कभी वसंत था ठहरा. 
कभी   यहीं पर बंधा था 
मेरे सर जीत का सेहरा. 
आज यहीं है खौफ 
और मौत सा कुहरा 
जिसे देख कर मेरा जिस्म है सिहरा.

(2) 
लम्बे  होने लगे आज फिर ये मौत के साए,
इन बेबाक आँखों में ये बेखौफ से आये.
ये शबनमी बिछौना अब दर्द की दास्तान हो गया, 
ये मखमली चदरा आज शरीरे कफ़न हो गया. 
(3) 
मेरे दर पे आने से पहले दस्तक दिया करो,   
जब तक मैं न कहूँ यूँ ही खड़े रहा करो. 
तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो, 
तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो. 

45 टिप्‍पणियां:

  1. Rachna ji...

    Dard kyon hai dikh raha...
    Chhhay teri har nazm main...
    Har tarf khushian hi khushian...
    Dekh lo tum vazm main...

    Gum ke tufan aaj beshak...
    Aa rahe tere kareeb...
    Door khushian bhi khadi hain...
    Ban ke teri hi rakeeb....

    Bhavpoorn krutiyan...

    Deepak Shukla..

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  2. कौन रुका है,
    साँसे भी तो,
    आती और,
    चली जाती हैं।

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  3. एक दर्द भरे अहसास को भवुक अभिव्यक्ति देती यह रचना मन को स्पर्श करती है।

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  4. तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो,
    तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.

    बेहतरीन पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.

    भावुक अभिव्यक्ति...

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  6. तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो,
    तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.

    इन पंक्तियों का काव्य सौंदर्य अनूठा है, अनुपम है।

    सभी कविताएं बहुत ही अच्छी लगीं।

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  7. तुम तो मेरी साँस हो, कभी तो रुक जाया करो...

    सारी बातों का निचोड़ इन पंक्तियों में समा गया, वाह !!!!

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  8. आज किसी अलग मूड में लिखी है यह रचना ।
    शायद फिर कोई दर्द उभर आया है ।

    तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो।
    इसका आशय समझ नहीं आया रचना जी । साँस भी भला कभी रूकती है ।

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  9. वाह रचना जी...
    बहुत खूसूरत गज़ल...

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  10. दर्द में डूबी अहसासों से भरी रचना ....
    मेरे दर पे आने से पहले दस्तक दिया करो,
    जब तक मैं न कहूँ यूँ ही खड़े रहा करो.|

    शुभकामनाएँ!

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  11. रचना जी ये भी आपकी एक सुंदर कविता है .

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  12. सुन्दर सारगर्भित रचना अच्छी लगी रचना जी .

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  13. बहुत ही खूबसूरत भावो की माला गूंथी है।

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  14. मनोभावों की ज़बरदस्त अभिव्यक्ति है आपकी कविता में.

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  15. "मेरे दर पे आने से पहले दस्तक दिया करो, जब तक मैं न कहूँ यूँ ही खड़े रहा करो;
    तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो,
    तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो"
    -----------------------------------
    सुन्दर रचनायें और हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ.

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  16. मौत सा कुहरा, मौत के साये...दर्द और कफन ये कुछ नयी सी कहानी कहते हैं...अंतिम बंद बहुत सुंदर बन पड़ा है, आभार!

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  17. ये कौन सा मंज़र देख आई हैं आप ? मौत के साये और कफ़न की बात ?

    मौत तो आनी है आएगी
    इंतज़ार है जिसका
    उसके आने से शायद
    साँस ही रुक जायेगी ... :):)

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  18. बहुत मर्मस्पर्शी...एक एक पंक्ति दर्द को जीवन्त करती हुई...बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  19. bahut hi khoobsurat rachna hai ,shukriyaan ,kai mahino door rahi sabse aur bahut kuchh chuk gayi .

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  20. बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
    सुन्दर सारगर्भित रचना अच्छी लगी

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  21. सुन्दर भाव एवं अभिव्यक्ति के साथ शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने! बधाई!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  22. बहुत सुंदर रचना. बधाई...
    मेरी नई पोस्ट....

    सब कुछ जनता जान गई ,इनके कर्म उजागर है
    चुल्लु भर जनता के हिस्से,इनके हिस्से सागर है,
    छल का सूरज डूब रहा है, नई रौशनी आयेगी
    अंधियारे बाटें थे तुमने, जनता सबक सिखायेगी,

    आपका स्वागत है

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  23. अन्तर को स्पर्श करती अभिव्यक्ति....
    सादर..

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  24. तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो,
    तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.

    लाज़बाब कर दिया...इन पंक्तियों ने...बहुत सुन्दर

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  25. मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  26. यहीं आके कभी वसंत था ठहरा.
    कभी यहीं पर बंधा था
    मेरे सर जीत का सेहरा.

    सुंदर पंक्तियाँ

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  27. कुछ कार्यालयीन व्यस्तता के कारण "संवेदना के स्वर" खामोश पड़ा है.. चैतन्य जी की व्यस्तता देखें कब टूटेगी.. वैसे हमारे बीच चर्चा चलाती रहती है और मैं उन्हें बताता भी रहता हूँ इन हलचलों के बारे में..
    आपकी यह कविताएं एक जीवन दर्शन प्रस्तुत करती है... एक यथार्थ, एक सच.. और सच का एक ऐसा रूप जो नया है, नवीन है और दिखता है एक नए आयाम की तरह!!

    उत्तर देंहटाएं
  28. ये मखमली चदरा आज शरीरे कफ़न हो गया.
    क्या बात है बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  29. क्या बात है रचना जी कुछ पन्तियाँ बहुत सुंदर लगी,...बेहतरीन पोस्ट .....
    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    नेता,चोर,और तनखैया, सियासती भगवांन हो गए
    अमरशहीद मातृभूमि के, गुमनामी में आज खो गए,
    भूल हुई शासन दे डाला, सरे आम दु:शाशन को
    हर चौराहा चीर हरन है, व्याकुल जनता राशन को,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

    उत्तर देंहटाएं
  30. आपका पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  31. मेरे दर पे आने से पहले दस्तक दिया करो, जब तक मैं न कहूँ यूँ ही खड़े रहा करो. तुम कोई हवा तो नहीं कि जब चाहो आया जाया करो, तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.


    हाय हाय!! ऐसी सख्त पाबंदी....
    सांस भी कहते हैं पर सांस नहीं लेते
    सागर क्या अपने सर कोई प्यास नहीं लेते

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  32. दर्द भरी प्रभावशाली क्षणिकाएँ । शुभकामनाएँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  33. bahut khoob .ab blog par aapse hi poochhkar aayen ya swayam aa jaya karen ?

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  34. सदा की तरह दिल को छूती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  35. तुम तो मेरी साँस हो कभी तो रुक भी जाया करो.

    exceelent

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  36. A topic near to my heart thanks, ive been wondering about this subject for a while.

    उत्तर देंहटाएं

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