रविवार, 4 दिसंबर 2011

इमारतें


इमारतें 

हमारे शहर की 
बुजुर्ग जर्जर खस्ताहाल इमारतें.    
कंपकंपाती हुई झुकी हुई.
फिर भी खड़ी हैं 
दम साधे डर के साये में  
कि कहीं आ न जाए 
कोई तेज हवा का झोंका. 
और ढह जाएँ वो 
और उनका इतिहास 
नहीं ...
मरने से नहीं डरतीं वो. 
डरतीं हैं इतिहास बनने से
कि इस शहर में 
कोई भी नहीं जीता 
भूत में वर्तमान में 
हर कोई जीता है भविष्य में 
और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं.

38 टिप्‍पणियां:

  1. भूत भविष्य और वर्तमान का सही ताल मेल होता तो दुनिया कुछ और होती!!!
    इमारतों का दर्द सटीक है!

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  2. हर कोई जीता है भविष्य में
    और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं.

    बखूबी कह रही हैं ये जर्जर इमारतों का दर्द...बहुत सुन्दर...बधाई|

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  3. बुलन्दी का जीवन जी अन्त निहारती इमारतें।

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  4. इस शहर में
    कोई भी नहीं जीता
    भूत में वर्तमान में
    हर कोई जीता है भविष्य में --

    सही कहा , जीना तो वर्तमान में ही चाहिए ।
    सुन्दर क्षणिका ।

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  5. मरने से नहीं डरतीं वो.
    डरतीं हैं इतिहास बनने से... chaahti hai ek bhavishy , bahut badhiyaa-

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  6. आपकी कविता में एकदम नई approach रहती है जो अच्छा लगता है.

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  7. सच का आईना दिखाती आपकी रचना .......आभार

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  8. बहुत ही बेहतरीन भावों का संगम ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. रचना जी बधाई ,ज्वलंत प्रश्न..???
    भूत में जिया नही जा सकता ,
    वर्तमान में जीना नही चाहते
    भविष्य का कोई पता नही ....
    फिर हम बूढी इमारतों को तो इतिहास ही बनना पड़े गा न....???

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  10. इतिहास नहीं बनना चाहतीं इमारतें ..आज कल तो मलबा बन कर रह जाती हैं ... वर्तमान को महत्त्व देती अच्छी प्रस्तुति

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  11. हर कोई जीता है भविष्य में
    और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं.

    बिलकुल सटीक बात।

    सादर

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  12. जर्जर हुई इमारतें ..भले ही अपनी हालत बयां नहीं कर पाती ..पर सच कहा आपने भूत ओर भविष्य में जूझती रहती हैं ...

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  13. सच कह रही हैं आप ...स्थिति चिंताजनक है !
    शुभकामनायें आपको !

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  14. फिर भी खड़ी हैं दम साधे

    डर के साये में कि कहीं आ न जाए

    कोई तेज हवा का झोंका.

    और ढह जाएँ वो

    बहुत ही सटीक बात कही है...

    उत्तर देंहटाएं
  15. सच्चाई को बड़े खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है! उम्दा रचना ! बेहद पसंद आया!

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  16. कविता में निहित गंभीर भाव मन की संवेदना को स्पर्श कर गए !
    बधाई हो इतनी सुन्दर कविता के लिए !

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  17. कहीं हम सब भी इमारत तो नहीं..

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  18. हर कोई जीता है भविष्य में
    और इन इमारतों का कोई भविष्य नहीं !
    सही कह रही है आप हर कोई भविष्य के
    सुनहरे सपने देखना चाहता है !

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. रचना जी,
    इमारतों की कथा/व्यथा आप ने शब्दों में पूर्णतः ढाल दी है... कभी मैंने भी इन इमारतों के बदन पट चाकू से गोदे जाते प्रेमी-प्रेमिकाओं के नाम पर एक पोस्ट लिखी थी...
    इमारतों में भी भेद-भाव, किस्मत, भाग्य जैसा कुछ होता है, तभी तो कोई ऐतिहासिक होने का दर्ज़ा पाकर स्वर्णिम भविष्य को उपलब्ध होती हैं और कोई खँडहर बनकर अतीत की यादें बनी रह जाती हैं..
    बहुत ही सुन्दर कविता!!

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  21. उम्र के उस पडाव पर इमारत और मानव के जीवन में कोई अंतर नहीं होता.... क्या पता कौन से हवा का झोंका कब उड़ा ले जाय!!!!!

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  22. कोई भी नहीं जीता
    भूत में वर्तमान में
    हर कोई जीता है भविष्य में

    Sach hai.... Bahut Sunder Kavita

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  23. बहुत खूब, सही बात कही है आपने
    इमारत कोई भी हो, कहीं न कहीं तो .........

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  24. रचना जी ,नमस्कार !
    भूत में जिया नही जा सकता
    वर्तमान में आजकल जीना नही चाहते
    भविष्य की किसी को ख़बर नही ....
    तो हम पुरानी इमारतों को तो इतिहास
    बनना ही है ...यही जिंदगी की सच्चाई है ..?
    शुभकामनाएँ!

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  25. वाह....अनोखे से विषय पर लिखी अच्छी रचना.
    शुभकामनाएं.

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  26. एक खुबशुरत बेहतरीन रचना बधाई ....
    नए पोस्ट में स्वागत है ...

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  27. इतिहास बनने से हर कोई डरता है लेकिन बचना मुमकिन नहीं .........

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  28. अंतस के भावों से सुंदर शब्दों में पिरोयी गयी आपकी रचना बेहद ही अच्छी लगी । मरे नए पोस्ट "आरसी प्रसाद सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  29. भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान यूं ही गुजर जाता है ...सुंदर अभिव्यक्ति

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  30. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
    इमारतों का दर्द उकेरती सुन्दर प्रस्तुति
    के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आप आयीं और सुन्दर टिपण्णी भी की.इसके लिए भी आपका दिल से आभारी हूँ.

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  31. शिकायत तो निर्जीव इमारतों को भी हो सकती है .... बहुत खूब !

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  32. हमारे शहर की बुजुर्ग जर्जर खस्ताहाल इमारतें. कंपकंपाती हुई झुकी हुई.
    फिर भी खड़ी हैं दम साधे डर के साये में
    ......सच का आईना दिखाती आपकी रचना

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  33. आदरणीया
    अब तो हर शहर की यही त्रासदी है.... त्रासदी को सही शब्दों में वयात करने का आभार
    बहुत सुन्दर

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  34. वक़्त को परिभाषित करने का बिल्कुल ही नया बिम्ब.

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