रविवार, 9 अक्तूबर 2011

बतकही


बतकही 


घर की छत पर रखे 
अचार, पापड़ और बड़ियाँ 
मायूस थे.
पास की छत पर पसरी 
ओढ़नी और अम्मा की साड़ी
धीमे धीमे बतिया रहे थे.
इतनी देर हो गयी, 
कहाँ रह गयी वो ..
आचार, पापड़ और बड़ियों ने 
अपनी अनभिज्ञता जताई,
पडोसी छत से गुहार लगाई
रुमाल ने छोटे शरीर की दुहाई दी.
तो अम्मा की साड़ी ने 
बढती उम्र की. 
आखिर निकलना ही पड़ा ओढ़नी को
कुछ दूर ही उड़ी. 
एक पेड़ की डाल पे,
बादल की छावं में
एक सफ़ेद सुनहरा देहावरण झूलता पाया.
कुछ अनहोनी की आशंका से दिल धड़का. 
अगले ही पल 
पास के पहाड़ की ओट से 
आती कुछ आवाजें.
जाकर देखा. 
अपने स्वभाव के विपरीत 
रुपहले गोटे वाले मटमैले घाघरे 
तिस पर
काले कांच सी पारदर्शी चुनर में उसे... 
लौट आई ओढ़नी..
चेहरे पे शरारत देख 
खीजी और बोल उठी साड़ी
अरे! ऐसा क्या देख आई...
दोनों हाथों से चेहरा छुपा के वो बोली
आज मैंने सांवले, 
मजबूत कद काठी वाले
बलिष्ठ पहाड़ की बाँहों में 
लिपट लिपट कर 
धूप जीजी को नहाते देखा है,  
सो आज न आयेंगी जीजी.

(चित्र दार्जीलिंग के पहाड़ों का मेरे खजाने से) 

52 टिप्‍पणियां:

  1. रचना जी की, रचना में, रचना जी के एहसास भी खूब और सुंदर बोलते हैं....

    शुभकामनाएँ!

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  2. इस प्रतीक्षा में बिताये क्षणों की हूक...

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  3. प्रकृति के पात्रों को आपने सजीव कर दिया।
    यह अनोखी कविता बहुत ही अच्छी लगी।

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  4. इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। आप उन विरल कवयित्रियों में से हैं जिनकी कविता एक अलग राह अपनाने को प्रतिश्रुत दिखती हैं। आपकी कविता में कथ्य और संवेदना का सहकार है जिसका मकसद इस संसार को व्यवस्थित और प्रेममय देखने की आकांक्षा है।

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  5. रचना जी , आपकी सोच में बहुत विस्तार और गहराई है । छोटी छोटी चीज़ों में बड़ी बड़ी बातें निकाल लेती हैं ।
    बहुत खूबसूरत प्रस्तुति ।

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  6. सुन्दर और सार्थक रचना , बधाई

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  7. Aap wo dekhti hain jo kisi ko nahi dikhta... wo soch leti hain jo kisi ko nahi soojhta aur wo keh paati hain jo koi aur itni khubsoorti se kabhi nahi keh sakta.. u r truelly awesome n so is dis poem.. :)

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  8. बहुत अच्छा लगा पढ़कर , बेहद खूबसूरत कविता !!

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  9. धूप जीजी ....
    सुंदर चित्र - सुन्दर कविता !

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  10. सुन्दर बिम्ब प्रयोग के माध्यम से गज़ब की रचना प्रस्तुत की है…………अन्दाज़ बहुत भाया।

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति....

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  12. खूबसूरत प्रस्तुति ||
    बधाई ||

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  13. aisa laga maano sab yahi ho raha ho... mai bhi us pal ka hissa ho gai... bahut-bahut shukriya... :)

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  14. इस प्रकार की रचना मन में बस जाती है इसके आगे कुछ नहीं .........

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  15. वाह! अद्भुत! सचमुच.... लगता है... ब्लॉग का कोना कोना मुस्कुरा उठा है इस रचना की रोशनी में...
    सादर बधाई....

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  16. बेहद रुचिकर , प्रभावशाली रचना पसंद आई , शुक्रिया जी /

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  17. आम चीज़ों से, अपने आसपास से नया विम्ब उठा कर बढ़िया कविता लिख रही हैं आप. बहुत सुन्दर.

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  18. Bahut hi sundar dhang se apne prakriti aur paryavaran ko chitrit kiya hai is kavita men...
    Poonam

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  19. रचना जी , क्या रचा है.. बहुत खूब..

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  20. धुप जीजी का मानवीकरण बहुत रोचक . अद्भुत है जी

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  21. दोनों हाथों से चेहरा छुपा के वो बोली
    आज मैंने सांवले,
    मजबूत कद काठी वाले
    बलिष्ठ पहाड़ की बाँहों में
    लिपट लिपट कर
    धूप जीजी को नहाते देखा है,
    सो आज न आयेंगी जीजी.


    अद्भुत!....सुन्दर प्रतीक ... संवेदनशील रचना ...शुभकामनायें।

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  22. आपकी काव्य शिल्प क्षमता बहुत अद्भुत है.
    और क्या लिखूं.

    निशब्द हूँ.

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  23. क्या बात है..दिल खुश कर दित्था। वाकई बहुत रोचक और जीवंत। बधाई स्वीकार करें।

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  24. बेहतरीन चित्र/ज़बरदस्त अभिव्यक्ति.

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  25. बहुत ही सुन्दर चित्र के साथ शब्दों का सजीव संयोजन किया है आपने.

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  26. वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है ... ।

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  27. वाह ! कविता पढ़कर एक अनोखा अहसास हुआ इसे फेसबुक पर शेयर करने का मन भी, आप से अनुमति चाहिए...

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  28. वाह!!वाह !!
    बहुत ही मासूम ..प्यारी सी अभिव्यक्ति

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  29. rachna ji
    bahut hi badhiya aur bahut hi shandaar tareeke se jo rachna ki hai ki man khud hi ---wah wah---kar utha.
    sach bahut bahut hi behatreen lagi aapki yah adhbhut rachna
    badhai
    poonam

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  30. वाह! आपके ब्लॉग पर आकर हर बार एक नयी अनुभूति होती है.....प्रकृति को जीवंत कर दिया..शब्दों और भावों का अद्भुत संयोजन..

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  31. बचपन याद आ गया ......
    आभार एक सुंदर रचना के लिए !

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  32. गज़ब की कल्पना! इस कविता की मौलिकता व अनूठे अंदाज ने मन मोह लिया। पढ़ पाया इसके लिए आपका आभारी हुआ।

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  33. आह, अद्भुत, जबर्दस्त। काव्य में जब तक काल्पनिक चमत्कृति न हो - मजा नहीं आता। दिल खुश कर दिया रचना दीदी।

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  34. आदरणीया रचना जी बहुत ही खूबसूरत कविता बधाई और शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  35. आदरणीया रचना जी बहुत ही खूबसूरत कविता बधाई और शुभकामनाएँ

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  36. कहते है जहाँ न कोई पहुंचे....
    कहते हैं वहां पर कवि पहुंचे......

    आपकी कल्पनाशीलता की दाद देनी पड़ेगी !!

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  37. अद्भुत सुन्दर रचना! लाजवाब प्रस्तुती !

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  38. बहुत प्यारी सी अभिव्यक्ति...

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  39. प्राकृति और एहसास को समेटे लाजवाब शब्द संयोजन किया है ... अनोखे बिम्ब प्रयोग किए हैं आपने ...

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