रविवार, 11 जुलाई 2010

मैनेक़ुइन

" मैनेक़ुइन"



मैनेक़ुइन हूँ , तो क्या हुआ  

मैं भी इंसानों सा दिल रखती हूँ

हर दिन मेरा पूनम होता

रात अमावस होती है

आधे कपड़े, पूरे कपड़े

ऐसे कपड़े, वैसे  कपड़े

जाने कैसे, कैसे कपड़े

कभी दुल्हन बनूँ

कभी नग्न रहूँ

सारा सारा दिन खड़ी रहूँ

रातों को पूरी ढकी रहूँ

मुझको भी लज्जा आती है

ऑंखें मेरी  भी भर आती हैं

सबकी बुरी नज़र सताती है

सारा दिन सब मुझको तकते हैं

मेरी बात न करते, थकते हैं

रात के अंधियारे में

हम सब मिल रोज़ सुबकते हैं

कोई मुझको भी आ कर ले जाये

घर में बिस्तर पर मुझे बिठाये

बिटिया जैसा प्यार जताए.

फिर क्यों न जीवन सफल हो जाये.


(Mannequin  - A life-size full or partial representation of the human body, used for the fitting or displaying of clothes; a dummy)





31 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sunder prastuti!... aatmaa ko zazkor kar rakhane waali rachana, dhanyawaad!

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  2. वाह रचना जी , आपने तो निर्जीव में भी ज़ान फूंक दी।
    बहुत सुन्दर प्रेक्षण ।

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  3. yahi kahenge rachna ji ki ek samvedansheel hriday hi Mannequin ko lekar bhi bhaavpoorn ho sakta hai

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  4. अपकी रचना ने एक निर्जीव पुतले में प्राण प्रतिष्ठा कर दी...प्राण ही नहीं हृदय प्रतिष्ठित कर दिया...कम से कम अब बाज़ारों में इन्हें देख आपकी याद अवश्य आएगी... अति सुंदर!!

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  5. आज तक हमे मनेकुइएन् को इस संवेदना से नहीं देखा.. अद्भुद विम्ब संरचना ... वैसे हम सब भी तो मेनेकुएँ की तरह तो हो गए हो गए हैं संवेदन हीन ! ऐसे में आपकी रचना और भी उद्वेलित करती हैं

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  6. "मैनेक़ुइन" का मानवीकरण - कवि हृदय की जितनी दाद दी जाये उतनी ही कम.

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  7. wah kya baat likh di...ab ek baat to pakki he market me jab b ye maikuin dekhungi...aapki rachana aur ye bhaav yaad aayenge.

    suder bhavo se bhari rachna.

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  8. ek karuna se bhara man hi kisi nirjiv me aise praan foonk sakta hai......

    bahut hi maarmik ban padi aapki ye kavita....

    kunwar ji,

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  9. वाह...यही है सम्वेदनशील होने की निशानी, जिसने एक बेजान पुतले में जान डाल दी. बहुत सुन्दर.

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  10. Hi..

    Kahte hain..

    Jahan na pahunche ravi..
    Vahan pahunche kavi..

    Aur aapne ye sabit kar diya.. Mera dawa hai ki aapki kavita padhne wale kisi bhi shakhs ne kabhi es sandarbh main socha tak na hoga.. Apni kahun to mere liye to yah shabd hi naya hai.. Bahrhal thanks ki aapne apni sanvedna se logon ki nazar main nirjeev Mainequeen ko bhi sajeev kar diya..

    Aap nihsandeh prashansa ki patr hain..

    Deepak..

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  11. आपने तो निर्जीव में भी ज़ान फूंक दी।


    सुंदर!

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  12. बहुत भावमय दर्द भरी रचना। धन्यवाद।

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  13. मन को छु लेने वाली अभिव्यक्ति |इसी को कहते है पुतले में भी जान फूकना |
    "समद्रष्टि "

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  14. " मैनेक़ुइन" kya hai ?jab tak ye pata nahi chalega kavita ka marm samajh hi nahi aayega sach to ye hai ki mujhe samajh hi nahi aaya?

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  15. बहुत ही संवेदनशील रचना है...आपने तो उस बेजुबान को भी जुबान दे दी ..और उसके मन की सारी व्यथा कह डाली

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  16. U r such a sensitive lady... i guess u have da power to hear the unspoken n to c da hidden truth...loved ur poem...

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  17. मैनीकुइन पर कोई कविता वो भी इतनी उम्दा पहली बार देखी.. अच्छी सोच..

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  18. apni ek alag pahchaan dikhati hui ek bahut sashkt aur prabhav dalti hui rachna.
    lajwaab,
    poonam

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  19. रचना जी बेहद भावपूर्ण...सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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  20. आपने तो मेनिकुइन में भी जान डाल दी .... बहुत भावपूर्ण रचना है ....

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  21. मैनेक़ुइन के ज़रिये आप ने दर्द भरी /संवेदनशील रचना कह दी है.

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  22. are wah .......kya baat hai........
    ye hai samvedansheelata..............ekdum anootha andaaz hai aapke likhane ka.............
    ek sashakt rachana..........
    bahut sunder komal bhavon kee abhivykti.

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  23. are ha do mahine nahee hoo shayad irregular rahoo blog par aane me par ser saver aaoongee jaroor......... shubhkamnae............

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  24. आप की कविताएं ओब्जेक्ट्स को बखूबी चुनती है. यह गहरी दृष्टि के बिना संभव नहीं होता. हालाँकि कविता को कई बार पढ़े जाने की जरुरत है फिर भी तीन बार पढ़ने के बाद आपको बधाई जरूर देना चाहता हूँ.

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