रविवार, 13 जून 2010

धुंआ

धुंआ





जाने कुछ अजीब सी बात है

तुममें

बुरी चीजों में भी कुछ अच्छा

सोच ही लेते हो अपने लिए

तभी तो तुमने धुंए से सीखा

ऊपर, ऊपर और ऊपर उठना

फैलना, मिलना, मशहूर होना

कभी आँखों में उतरना

फिर वो भला आंसू की तरह ही क्यों न हो

तुम्हारी रुचि तो

जलने, जलाने, धुंए और राख में है ना !!!

फिर तुमने सिगरेट को ही क्यों चुना ???

शायद तुम्हारी चाहत हो

तुम धुंआ और ऊँचाई

मैं राख और तुम्हारे एकदम पास

तुम्हारे ही क़दमों में,

पर क्यों नहीं चुना तुमने

किसी थर्मल पावर प्लांट को,

उसके कोयले को

जहाँ तुम वही धुंआ, ऊँचाई,

पर मैं, राख, नहीं!!

फ्लाई ऐश,

और पांव न...हीं

मेहनतकश लोगों के हाथों का कोमल स्पर्श

और बन सकूँ एक खुबसूरत, पर सुदृढ़ ईंट

कहीं दीवार बन, दे सकूँ अपनापन

कहीं ममता की छावं देती छत

कभी एक भरपूर घर का अहसास

ये सच है,  कि  तुम अच्छा सोच लेते हो

पर इतना अच्छा भी नहीं !!!



30 टिप्‍पणियां:

  1. Kya gazab udaan hai kalpnaaa kee....kitnee oonchee uthi hui...dhuen se kahin adhik!

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  2. सच है, अच्छा होना सही है । लेकिन बेहतर होना और भी अच्छा है ।
    एक प्रेरणात्मक पोस्ट जो बुराइयों को मिटाने को उकसा रही है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सूक्ष्म पर बेहद प्रभावशाली कविता...सुंदर अभिव्यक्ति..प्रस्तुति के लिए आभार जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. मिलना -मिलना सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा होता है जो सबके बस का नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  5. नई सोच की कविता... शायद फ्लाई एश के बारे में कविता नहीं लिखी गई है अभी तक... नवीनतम बिम्ब... सुंदर विश्लेषण... गहरी सोच...

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  6. धुंआ
    ....इसके माध्यम से बड़ी बात कहने की कोशिश है कविता में. शुरुवाती पंक्तियाँ लाजवाब हैं. धुआं एक तरफ हमें ऊंचा उठने की प्रेरणा देता है वहीँ दूसरी तरफ एक भटकाव भी है..फिर तुमने सिगरेट को ही क्यों चुना ??? अंत में एक सन्देश कि मेहनतकश हाथों से निकला धुआं घर का निर्माण करता है.
    ..सोच ही लेते ही अपने लिए ..सोच लेते हो अपने लिए ..बना दें.
    ...बधाई.

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  7. आपकी कल्पनाशीलता को सादर नमन

    उत्तर देंहटाएं
  8. मेहनतकश लोगों के हाथों का कोमल स्पर्श
    और बन सकूँ एक खुबसूरत, पर सुदृढ़ ईंट
    कहीं दीवार बन, दे सकूँ अपनापन
    कहीं ममता की छावं देती छत
    कभी एक भरपूर घर का अहसास
    ये सच है, कि तुम अच्छा सोच लेते हो
    पर इतना अच्छा भी नहीं !!!

    Bahut behatareena aur leek se hat kara likhee gayee kavita ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. waah !bahut khoob
    ये सच है, कि तुम अच्छा सोच लेते हो

    पर इतना अच्छा भी नहीं !!
    ye to sach hai magar kabhi aankhon ko jala bhram jaal me bhi bandhti hai .bha gayi .

    उत्तर देंहटाएं
  10. उँचा उड़ना ठीक है पर .. हक़ीकत में रहना ... अच्छा रहना ज़रूरी है ... उर्जा देती है ये रचना ...

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  11. धुआ और राख से जिंदगी के भावो को क्या बखूबी सजाया है .....अब तो धुआ, राख, ईंट,गारा सब आपसे लगाव रखेंगे ......इतना प्यार जों मिला आपसे ...पहचान के नए मायने मिलेउन्हें :)

    उत्तर देंहटाएं
  12. एक विचारपूर्ण, बहुत ही सुन्दर कविता है.

    पर क्यों नहीं चुना तुमने
    किसी थर्मल पावर प्लांट को,
    उसके कोयले को
    जहाँ तुम वही धुंआ, ऊँचाई,
    पर मैं, राख, नहीं!!

    ये सच है, कि तुम अच्छा सोच लेते हो
    पर इतना अच्छा भी नहीं !!!

    शायद इन पंक्तियों में ही पूरी कविता का सार है. बिम्बों के माध्यम से मानवीय संबंधों में उभरे सूक्ष्म भावनाओं की विवेचना बहुत सुन्दरता से किया है आपने. कथ्य बहुत ही प्रभावशाली है. बहुत सुन्दर कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  13. एक विचारपूर्ण, बहुत ही सुन्दर कविता है.

    पर क्यों नहीं चुना तुमने
    किसी थर्मल पावर प्लांट को,
    उसके कोयले को
    जहाँ तुम वही धुंआ, ऊँचाई,
    पर मैं, राख, नहीं!!

    ये सच है, कि तुम अच्छा सोच लेते हो
    पर इतना अच्छा भी नहीं !!!

    शायद इन पंक्तियों में ही पूरी कविता का सार है. बिम्बों के माध्यम से मानवीय संबंधों में उभरे सूक्ष्म भावनाओं की विवेचना बहुत सुन्दरता से किया है आपने. कथ्य बहुत ही प्रभावशाली है. बहुत सुन्दर कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  14. रचना इन कल्पनाओं के पर कितने बडे होते हैं ये तो पता था लेकिन जिस उचाई तक तुम्हारी कल्पना के पर उदे हैं वो कम ही देखने को मिलता है। बधाई इस सुन्दर रचना के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  15. नवीन प्रतिमानों से सजी, सूक्ष्म विश्लेषण करती हुई उत्कृष्ट रचना..... वाह!

    बधाई!

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  16. नए बिम्बों का बड़ी ही खूबसूरती से भावाभिव्यक्ति में प्रयोग किया है रचना जी..
    बहुत अच्छी कविता.

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  17. तुम धुंआ और ऊँचाई

    मैं राख और तुम्हारे एकदम पास

    तुम्हारे ही क़दमों में,

    एक बार कुछ ऐसे ही मनोभावों की कविता लिखी थी ......

    सलाम है मेरा ऐसे रिवाजों को
    ऐसे दस्तूरों से ....
    जहां औरत को ही झुकना पड़ता है.....

    कुछ वैसे ही भाव लिए आपकी सशक्त कविता ,.......!!

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  18. यथार्थ में होते हुए भी

    कभी अपनी उपस्थिति

    न दर्ज करा पाने का दर्द समझो
    बहुत सुन्दर है रचना जी.

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  19. sachchai ko awgat karati Maa ki aashish..........:)

    bahut prernadayak post........aur dil ke kareeeb!!


    nimantran: hamare blog pe aane ka:D

    उत्तर देंहटाएं
  20. चाँद पर इस से सार्थक रचना ढूढना मुश्किल है...चाँद के हर रूप को आपने नया आयाम दिया है...इस विलक्षण रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  21. शाईर इब्ने इंशा चाँद के दीवाने थे
    उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में आधे से ज्यादा चाँद गवाह होता या फिर वे उसे ही संबोधित होती.
    आपने भी खूबसूरत कविता कही है. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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