रविवार, 4 अप्रैल 2010

अन्वेषण


अन्वेषण





आज की इस दौड़ में

सब कुछ नया करने की होड़ में,

कितना कुछ बदल गया है.

असमंजस में पड़ गयी मैं,

जब सुना,

इतने बरसों बाद भी,

नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,

डूब गया मन,

तत्क्षण ही  तम के ताल में.

ऊपर आने, उबराने के,

तलाशने लगा विकल्प.

एक कंचन  कौंध का  क्षीण सा संबल ले,

उत्प्लावित हो उठा.

निराशा के  निरीह पोखर से,

निर्वस्त्र बौखलाया सा.

आर्कमिडिज की भांति,

चीत्कार उठा मन

यूरेका, यूरेका, यूरेका,

क्योंकि पा लिया था उसने,

विज्ञान के माध्यम से

प्रेमाभिव्यक्ति में एक नयापन,

किंकर्तव्यविमूढ़ सा कह ही उठा,

मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे

मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे

हैं दूर दूर पर साथ सदा रे

मैं समीकरण, तुम सिद्धांत  हमारे.



24 टिप्‍पणियां:

  1. adbhut........
    bahut sunder aur vigyan ko apane dayre me lepettee bouddhik rachana pad kar mazaa aa gaya...............

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  2. मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे
    मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे
    हैं दूर दूर पर साथ सदा रे
    मैं समीकरण, तुम सिद्धांत हमारे.

    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति।
    आपकी हिंदी भाषा के ज्ञान के कायल हैं हम तो ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर शब्द संयोजन.
    प्रभावी भाव अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  4. इतने बड़े कैनवास पर उकेरी गई बेहतरीन रचना...
    शानदार...

    आलोक साहिल

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर शब्द संयोजन.
    प्रभावी भाव अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. vaigyani drishtikon ke aadhaar par rachi adbhut rachna ,
    अब अपना विश्वास बढा है ,

    जो भी होगा हित में होगा |

    घटा अंधेरी छंटने वाली ,

    नया सवेरा आता होगा
    kya baat kahi man ko chhoo gayi .hum bhi kayal hai is sundarata par .

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज की इस दौड़ में
    सब कुछ नया करने की होड़ में,
    कितना कुछ बदल गया है.
    असमंजस में पड़ गयी मैं,
    जब सुना,
    इतने बरसों बाद भी,
    नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,
    ....संवेदनशील प्रस्तुति......
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  8. जब सुना,
    इतने बरसों बाद भी,
    नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,

    ये विज्ञान और सिद्धांत प्रेम पर कहाँ चल पाते हैं.....बहुत सुन्दर शब्दों से साज्ये हैं आपने अपने भाव....बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. असमंजस में पड़ गयी मैं,
    जब सुना,
    इतने बरसों बाद भी,
    नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,

    निराशा के निरीह पोखर
    निर्वस्त्र
    प्रेमाभिव्यक्ति में किंकर्तव्यविमूढ़
    चंचल चपला

    समीकरण सिद्धांत
    त्वरित अनुचर

    नयापन चाहते हैं जो
    वो शायद प्रेम भी अनुकरण मुद्रा में करते हैं

    प्रेम की अभिव्यक्ति संवाद...!?
    निश्शब्द है प्रेम


    अच्छे प्रश्न हैं
    उत्तर के साथ

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ही प्रभावशाली रचना है, शब्दों का सुन्दर संयोजन

    उत्तर देंहटाएं
  11. शब्‍द व भाव दोनों अच्‍छे लगे। सुंदर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  12. विज्ञान के माध्यम से
    प्रेमाभिव्यक्ति में एक नयापन,
    किंकर्तव्यविमूढ़ सा कह ही उठा,
    मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे
    मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे
    हैं दूर दूर पर साथ सदा रे
    मैं समीकरण, तुम सिद्धांत हमारे.
    Esse achhi प्रेमाभिव्यक्ति kya ho sakti hai.....आज की इस दौड़ में
    सब कुछ नया करने की होड़ में... sundar abhivyakti ki liye shubhkamnayne....

    उत्तर देंहटाएं
  13. "विज्ञान के माध्यम से
    प्रेमाभिव्यक्ति में एक नयापन,
    किंकर्तव्यविमूढ़ सा कह ही उठा,
    मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे
    मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे
    हैं दूर दूर पर साथ सदा रे"
    हर बार की तरह नए शब्दों और प्रयागों के माध्यम से एक और शानदार रचना - हार्दिक बधाई और धन्यवाद्.

    उत्तर देंहटाएं
  14. . बहुत अच्छी बात ।सब कुछ नया हो रहा है आविष्कार नये नये हो रहे है किन्तु प्रेम संबाद मे कोई नया पन नही आया है सोचते ही मन का अन्धकार मे चले जाकर बाहर निकलने की चेष्टा करना और एक दम यूरेका (मिल गया मिल गया )चिल्लाना क्योंकि विज्ञान के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति में नया पन मिला ।समीकरण का सिद्धान्त ।ये हुआ वैज्ञानिक प्रेम का गणित यानी अन्वेषण |बहुत उम्दा

    उत्तर देंहटाएं
  15. "बहुत ही प्रभावशाली रचना है, शब्दों का सुन्दर संयोजन"
    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  16. गज़ब ही सजाए हैं आपने यह शब्द ! और यह पंक्तियाँ तो बहुत ही मोहक बन गयी हैं -
    "मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे
    मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे
    हैं दूर दूर पर साथ सदा रे
    मैं समीकरण, तुम सिद्धांत हमारे."


    आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. रचना जी
    मैं चंचल चपला, तुम आलाप बेचारे

    मैं त्वरित रहूँ तू अनुचर हो जा रे

    हैं दूर दूर पर साथ सदा रे

    मैं समीकरण, तुम सिद्धांत हमारे.
    विज्ञान के बिम्वों के सहारे बड़ी खूबसूरती से बात कह डाली आपने....... यूरेका यूरेका.....वाह वाह...!

    उत्तर देंहटाएं
  18. हर बार की तरह नए शब्दों और प्रयागों के माध्यम से एक और शानदार रचना - हार्दिक बधाई और धन्यवाद्.

    उत्तर देंहटाएं
  19. "वाह देवेन्द्र जी,दो दिन पहले आंधी आई थी मैंने सोचा की टिकोरे ले आऊं कुछ पना और चटनी हो जाए.पर बाज़ार से तो टिकोरे गायब थे"

    रचना जी पहली बात तो ये की आपका नाम अपने आप में प्रभावी है और दूसरा ये ऊपर लिखी हुई पंक्ति ..इन्होने आपके ब्लॉग तक आने को मजबूर किया .

    लेकिन ख़ुशी हुई आपकी रचनाओं को पढ़कर और दुःख इस बात का की आप जैसी कवियत्री और टिकोरो की ख्वाहिश ..बड़ी छोटी सी बात कह दी आपने
    कहिये कहाँ भेज दें आपके लिए दिल्ली इतनी दूर तो नहीं है आपकी दुआ से बुजुर्गो की निशानी आम का बाग़ अभी तक बचा हुआ है कितने दिन बचेगा ये नहीं कह सकते .
    और हाँ आप आंधी की तमन्ना न करें ..आंधी के आम गिने नहीं जाते .

    yakinan aapka lekhan prabhavi hai ..bandhai swikaren

    उत्तर देंहटाएं

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