रविवार, 27 दिसंबर 2009

मेरा मन


मेरा मन




 बांच रही थी रात चांदनी
जब मेरी आँखे और मेरा मन.
पूनम के नयनों से भी छलके थे
कुछ सुधा सने हिम कण.
 उस क्षण
मौन   थी भाषा, मौन थे शब्द,
शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं
अंतर अन्दर बिफर रही थी
सांसें तन से छूट रहीं थीं
हिमखंडों सी टूट रहीं थीं
टूटी साँसों की तूलिका
ओस की बूंदों के आईने में
कुछ चित्र अधूरे खींच रहीं थीं
दृग कोटर भी भींज रहे थे
अरु मन पाती को सींच रहे थे
क्योंकि
पास कहीं तुम, किसी ओट में
निशा, यामिनी  और किरण को
अपनी बाहों में भींच रहे थे
और तब मैं
 अपने  उर के शूलों को

अपने लहू से सींच रही थी.

28 टिप्‍पणियां:

  1. मौन थी भाषा, मौन थे शब्द,
    शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं

    टूटी साँसों की तूलिका
    ओस की बूंदों के आईने में
    कुछ चित्र अधूरे खींच रहीं थीं

    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्दों के सौदर्य की ओट से महादेवी से एहसास हैं

    उत्तर देंहटाएं
  3. मौन थी भाषा, मौन थे शब्द,
    शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं
    अंतर अन्दर बिफर रही थी
    सांसें तन से छूट रहीं थीं
    हिमखंडों सी टूट रहीं थीं
    टूटी साँसों की तूलिका
    ओस की बूंदों के आईने में
    कुछ चित्र अधूरे खींच रहीं थीं ...

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति के साथ ,,,... बहुत सुंदर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्योंकि
    पास कहीं तुम, किसी ओट में
    निशा, यामिनी और किरण को
    अपनी बाहों में भींच रहे थे
    और तब मैं
    अपने उर के शूलों को

    अपने लहू से सींच रही थी.


    -शानदार अभिव्यक्ति!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. अपने लहू से सींच रही थी.!!
    वाह !रचना जी अद्भुत !अतुलनीय !
    मृग मरीचिका को शब्दों में जीवंत कर दी !
    parmatma is lekhani ko umar de !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

    उत्तर देंहटाएं
  7. पूरा गीत ही पसंद आया परन्तु अंत की पंक्तियाँ तो बहुत आकर्षित कर रही हैं

    पास कहीं तुम, किसी ओट में
    निशा, यामिनी और किरण को
    अपनी बाहों में भींच रहे थे
    और तब मैं
    अपने उर के शूलों को
    अपने लहू से सींच रही थी.

    उत्तर देंहटाएं
  8. bahut hi sundar rachna jo nishabd to kar hi di saath hi mahadevi varma ji ki yaad taaza kar gayi ,aur main jaa rahi hoon ab unhe padhne ,kai din ho gaye rahe aapki rachna padhkar phir man ho gaya .

    उत्तर देंहटाएं
  9. मौन थी भाषा, मौन थे शब्द,
    शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं

    टूटी साँसों की तूलिका
    ओस की बूंदों के आईने में
    कुछ चित्र अधूरे खींच रहीं थीं
    ati sundar ,jawab nahi

    उत्तर देंहटाएं
  10. नव वर्ष की अशेष कामनाएँ।
    आपके सभी बिगड़े काम बन जाएँ।
    आपके घर में हो इतना रूपया-पैसा,
    रखने की जगह कम पड़े और हमारे घर आएँ।
    --------
    2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन
    साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के पुरस्कार घोषित।

    उत्तर देंहटाएं
  11. behad khoobsorat...behad sanjeeda khayaal...waah !!! Aisay hi likhtii rahein...

    उत्तर देंहटाएं
  12. aapkaa man dekha. any rachanaye bhi dekhi. 'rachanakar' me aapne meri rachana(vyangy)par tippani kee to aape blog ka bhi pata chala. bahut hi sundar bhavnae... ab jiska naam hi 'rachana' ho, to usame rachana kee pravritti to janmjaat hogi hi. badhai isee tarah likhatee rahe.

    उत्तर देंहटाएं
  13. पास कहीं तुम, किसी ओट में

    निशा, यामिनी और किरण को

    अपनी बाहों में भींच रहे थे

    और तब मैं

    अपने उर के शूलों को


    अपने लहू से सींच रही थी.

    वाह ....रचना जी बहुत सुंदर .....निशा, यामिनी और किरण का सुंदर प्रयोग किया है आपने और उर के शूलों को लहू से सींचने की बात .....कमाल का प्रयोग .....बहुत सुंदर .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. मौन थी भाषा, मौन थे शब्द,
    शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं
    अंतर अन्दर बिफर रही थी
    सांसें तन से छूट रहीं थीं
    हिमखंडों सी टूट रहीं थीं

    रचना जी,
    आपकी ये रचना बहुत भावविभोर कर देने वाली है..बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.....बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  15. टूटी साँसों की तूलिका
    ओस की बूंदों के आईने में
    कुछ चित्र अधूरे खींच रहीं थीं...

    बहुत ही सुंदर रचना है। नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ ब्लाग जगत में द्वीपांतर परिवार आपका स्वागत करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. आपको नये साल २०१० की असंख्य शुभ कामनाये !

    उत्तर देंहटाएं
  17. Rachna ji bahut bahut shukriya jo aap mere blog par aayi aur jiske maadhyam se me aap tak pahunch payi aur aapki bahut si rachnaye padhi aur dil me ek anokhi jageh bana li aapne. bahut acchhi rachnaye padhne ko mili jinhe baar baar padhne ko man kiya.
    bahut bahut shukriya. aapka lekhan saundarye bahut umda hai.

    nav varsh mangalmay ho.

    उत्तर देंहटाएं
  18. मेरे ब्लॉग पर भी आपकी नि;शब्दता बहुत कुछ कह गयी और आपके ब्लॉग पर भी आपके मन की भाषा बहुत मुखर लगी .

    उत्तर देंहटाएं
  19. सुन्दर अभिव्यक्ति.....
    लाजबाव ......
    आपको भी नववर्ष के हार्दिक शुभकामनायें

    ..

    उत्तर देंहटाएं
  20. भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
    सुंदर रचना....

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  21. पास कहीं तुम, किसी ओट में
    निशा, यामिनी और किरण को
    अपनी बाहों में भींच रहे थे
    और तब मैं
    अपने उर के शूलों को
    अपने लहू से सींच रही थी....

    सुंदर भावा-व्यक्ति .......... अनुपम रचना .......

    उत्तर देंहटाएं
  22. तुम सात जनम मैं साथ तुम्हारा ...kahan se soojh jaatee hain aapko itnee sundar panktiyan?

    उत्तर देंहटाएं
  23. हैरान हूँ आपके शब्द कौशल को देख कर...विलक्षण रचना...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  24. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...